पदार्थान्वयभाषाः - [१] सुमित्र प्रार्थना करता है कि (देवानां अग्रयावा) = देवों के अग्र स्थान में गति करनेवाला, अर्थात् देवों का अधिपति प्रभु (इह) = इस हमारे हृदय में (आयातु) = आये । वह प्रभु जो कि (नराशंसः) = मनुष्यों से शंसनीय व स्तुति करने योग्य है। जीवन में उन्नति का मार्ग यही है कि हम प्रातः उठने पर हृदय में प्रभु का ध्यान करें। प्रभु का स्तवन करते हुए प्रभु के गुणों को धारण करने का प्रयत्न करें। [२] [क] (विश्वरूपेभिः) = सम्पूर्ण विश्व का निरूपण करनेवाली, इस ब्रह्माण्ड में 'आदित्य- समुद्र - पर्वत' आदि विभूतियों का विचार करनेवाली, (अश्वै) = इन्द्रियों से वे प्रभु (मियेध:) = संगतिकरण योग्य हैं। जब इन्द्रियों से इस ब्रह्माण्ड में हम प्रभु की महिमा को देखेंगे तभी प्रभु के आभास को प्राप्त करके उस प्रभु से मिलनेवाले होंगे। [ख] (ऋतस्य पथा) = ऋत के मार्ग से वे प्रभु [मियेध:-] मिलने योग्य हैं। प्रभु से हमारा मेल तभी होगा जब कि हम ऋत के मार्ग का अनुसरण करेंगे। सब कार्यों को ठीक समय पर करते हुए हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं। [ग] (नमसा) = नमन के द्वारा प्रभु [मियेधः ] मिलने योग्य हैं। प्रातः - सायं प्रभु के चरणों में नतमस्तक होते हुए हम प्रभु के अधिकाधिक समीप आते चलते हैं । [३] ये प्रभु (देवतमः) = सर्वमहान् देव हैं, 'देवानामग्रयावा' हैं। ये (देवेभ्यः) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों के लिये (सुषूदत्) = सब प्रकार के मलों का क्षरण करनेवाले होते हैं। शरीर से मलों का क्षरण करके ये हमें स्वास्थ्य प्रदान करते हैं, मनों के मल का क्षरण करके हमें राग-द्वेषातीत निर्मल मन प्राप्त कराते हैं और बुद्धि को निर्मल करके हमें तत्त्वदर्शन के योग्य बनाते हैं
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रातः हृदयों में प्रभु का ध्यान करें। ये प्रभु ब्रह्माण्ड में प्रभु की विभूतियों का निरूपण करनेवाली इन्द्रियों से, ऋत के पालन से तथा नमन से प्राप्त होते हैं। हमारे मलों को दूर करके हमें 'देव' बनाते हैं ।