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आग्ने॑ वह॒ वरु॑णमि॒ष्टये॑ न॒ इन्द्रं॑ दि॒वो म॒रुतो॑ अ॒न्तरि॑क्षात् । सीद॑न्तु ब॒र्हिर्विश्व॒ आ यज॑त्रा॒: स्वाहा॑ दे॒वा अ॒मृता॑ मादयन्ताम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āgne vaha varuṇam iṣṭaye na indraṁ divo maruto antarikṣāt | sīdantu barhir viśva ā yajatrāḥ svāhā devā amṛtā mādayantām ||

पद पाठ

आ । अ॒ग्ने॒ । व॒ह॒ । वरु॑णम् । इ॒ष्टये॑ । नः॒ । इन्द्र॑म् । दि॒वः । म॒रुतः॑ । अ॒न्तरि॑क्षात् । सीद॑न्तु । ब॒र्हिः । विश्वे॑ । आ । यज॑त्राः । स्वाहा॑ । दे॒वाः । अ॒मृताः॑ । मा॒द॒य॒न्ता॒म् ॥ १०.७०.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:70» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! तू (नः-इष्टये) हमारे इष्टसुख की प्राप्ति के लिए (दिवः-वरुणम्-इन्द्रम्) मेघमण्डल से जल को, विद्युत् को प्राप्त करा (अन्तरिक्षात्-मरुतः-आ वह) तथा अन्तरिक्ष से वृष्टि के हेतुरूप वायुओं को प्रेरित कर (विश्वे यजत्राः स्वाहा) सारे याजक यजनीय पूज्य विद्वान् अच्छे होम करने के लिए (बर्हिः-आसीदन्तु) यज्ञस्थान में विराजमान हों (अमृताः-देवाः-मादयन्ताम्) जीवन्मुक्त विद्वान् हर्षित करें ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा हमारी इष्टसिद्धि के लिए मेघमण्डल से जल को बरसाता है और अन्तरिक्ष से वर्षा करानेवाली हवाओं को प्रेरित करता है। एतदर्थ याजक लोग यजन करते हैं और जीवन्मुक्त विद्वान् हर्षित करते हैं ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान-प्राणायाम व मध्यमार्ग

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि हे अग्ने प्रगतिशील जीव ! (नः) = हमारी (इषये) = पूजा के लिये व प्राप्ति के लिये (वरुणम्) = द्वेष - निवारण की वृत्ति को आवह सर्वथा प्राप्त करनेवाला बन । अपने में तू निर्देषता को धारण कर । राग-द्वेष से पूर्ण हृदय में प्रभु का निवास नहीं हो सकता । प्रभु प्राप्ति के लिये तू (इन्द्रम्) = जितेन्द्रियता को (आवह) = सर्वथा प्राप्त करनेवाला हो । इन्द्र वही है जो इन्द्रियों का अधिष्ठाता है। [२] इस निर्दोषता व जितेन्द्रियता को तू [क] (दिवः) = ज्ञान के प्रकाश से प्राप्त कर । जितना - जितना ज्ञान बढ़ेगा तू उतना उतना ही तू निद्वेष व जितेन्द्रिय हो पायेगा । [ख] निर्देषता व जितेन्द्रियता को तू (मरुतः) = प्राणों के द्वारा प्राप्त कर प्राणसाधना तेरे लिये इन्हें सुगमता से प्राप्त होने योग्य करेगी। [ग] (अन्तरिक्षात्) = मध्यमार्ग में [अन्तराक्षि] चलने से भी तू जितेन्द्रिय व निर्दोष बन पायेगा। [३] ज्ञान-प्राणसाधना व मध्यमार्ग में चलने से (विश्वे) = सब (यजत्राः) = (यष्टव्य) = पूजा के योग्य दिव्य भावना में (बर्हिः) = वासनाशून्य हृदय में (आसीदन्तु) = आसीन हों। दिव्य भावनाएँ यजत्र हैं, इनकी प्राप्ति के लिये ज्ञान [स्वाध्याय] प्राणायाम व मध्यमार्ग में चलना आवश्यक है। [३] इन दिव्य भावनाओं को प्राप्त करके (देवा:) = देववृत्तिवाले लोग (स्वाहा)= स्व का त्याग करनेवाले हों, त्यागपूर्वक ही सदा संसार के सब पदार्थों का उपभोग करें। इस त्यागपूर्वक उपभोग व यज्ञशेष के सेवन से ही ये (अमृता:) = नीरोग होते हैं, ये नीरोग देव (मादयन्ताम्) = जीवन में निरन्तर आनन्द का अनुभव करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्वाध्याय, प्राणायाम व मध्यमार्ग को अपनाकर निद्वेष व जितेन्द्रिय बनें। यही सच्ची प्रभु-पूजा है। देव त्यागपूर्वक उपभोग करते हैं, अतएव अमर व नीरोग होते हैं । सूक्त का प्रारम्भ वेद ज्ञान को अपनाने के आदेश से होता है, [१] समाप्ति पर उसके परिणामरूप निर्दोष व जितेन्द्रिय बनने का उल्लेख हैं, [११] अब इस वेदज्ञान का सृष्टि के प्रारम्भ में दिये जाने का उल्लेख करते हैं-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! त्वम् (नः-इष्टये) अस्माकमिष्टसुखप्राप्तये “इष्टये सुखसिद्ध्यै” [ऋ० १।३०।१२ दयानन्दः] (दिवः-वरुणम्-इन्द्रम्-अन्तरिक्षात्-मरुतः-आवह) मेघमण्डलाज्जलं विद्युतं प्रापय तथाऽन्तरिक्षात्-मरुतः-वायून् वृष्टिहेतून् प्रापय-प्रेरय (विश्वे यजत्राः स्वाहा-बर्हिः-आसीदन्तु) सर्वे याजका यजनीयाः पूज्या विद्वांसो होमकरणाय यज्ञस्थानं विराजन्तां (अमृताः-देवाः-मादयन्ताम्) जीवन्मुक्ताश्च विद्वांसो हर्षयन्तु ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Hey Agni, lord of cosmic light and living energy, bring us Varuna, water from the ocean and the clouds for our cherished yajna of the good life, Indra, light and power from the heavens, and Maruts, winds from the middle regions. May all divine yajna powers and holy yajakas of the world come and join our vedi with the chant of svaha, in truth of thought, word and deed. May all the immortal divinities rejoice and may they give us joy-