ज्ञान-प्राणायाम व मध्यमार्ग
पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि हे अग्ने प्रगतिशील जीव ! (नः) = हमारी (इषये) = पूजा के लिये व प्राप्ति के लिये (वरुणम्) = द्वेष - निवारण की वृत्ति को आवह सर्वथा प्राप्त करनेवाला बन । अपने में तू निर्देषता को धारण कर । राग-द्वेष से पूर्ण हृदय में प्रभु का निवास नहीं हो सकता । प्रभु प्राप्ति के लिये तू (इन्द्रम्) = जितेन्द्रियता को (आवह) = सर्वथा प्राप्त करनेवाला हो । इन्द्र वही है जो इन्द्रियों का अधिष्ठाता है। [२] इस निर्दोषता व जितेन्द्रियता को तू [क] (दिवः) = ज्ञान के प्रकाश से प्राप्त कर । जितना - जितना ज्ञान बढ़ेगा तू उतना उतना ही तू निद्वेष व जितेन्द्रिय हो पायेगा । [ख] निर्देषता व जितेन्द्रियता को तू (मरुतः) = प्राणों के द्वारा प्राप्त कर प्राणसाधना तेरे लिये इन्हें सुगमता से प्राप्त होने योग्य करेगी। [ग] (अन्तरिक्षात्) = मध्यमार्ग में [अन्तराक्षि] चलने से भी तू जितेन्द्रिय व निर्दोष बन पायेगा। [३] ज्ञान-प्राणसाधना व मध्यमार्ग में चलने से (विश्वे) = सब (यजत्राः) = (यष्टव्य) = पूजा के योग्य दिव्य भावना में (बर्हिः) = वासनाशून्य हृदय में (आसीदन्तु) = आसीन हों। दिव्य भावनाएँ यजत्र हैं, इनकी प्राप्ति के लिये ज्ञान [स्वाध्याय] प्राणायाम व मध्यमार्ग में चलना आवश्यक है। [३] इन दिव्य भावनाओं को प्राप्त करके (देवा:) = देववृत्तिवाले लोग (स्वाहा)= स्व का त्याग करनेवाले हों, त्यागपूर्वक ही सदा संसार के सब पदार्थों का उपभोग करें। इस त्यागपूर्वक उपभोग व यज्ञशेष के सेवन से ही ये (अमृता:) = नीरोग होते हैं, ये नीरोग देव (मादयन्ताम्) = जीवन में निरन्तर आनन्द का अनुभव करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्वाध्याय, प्राणायाम व मध्यमार्ग को अपनाकर निद्वेष व जितेन्द्रिय बनें। यही सच्ची प्रभु-पूजा है। देव त्यागपूर्वक उपभोग करते हैं, अतएव अमर व नीरोग होते हैं । सूक्त का प्रारम्भ वेद ज्ञान को अपनाने के आदेश से होता है, [१] समाप्ति पर उसके परिणामरूप निर्दोष व जितेन्द्रिय बनने का उल्लेख हैं, [११] अब इस वेदज्ञान का सृष्टि के प्रारम्भ में दिये जाने का उल्लेख करते हैं-