वांछित मन्त्र चुनें
देवता: अग्निः ऋषि: त्रितः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

इ॒मा अ॑ग्ने म॒तय॒स्तुभ्यं॑ जा॒ता गोभि॒रश्वै॑र॒भि गृ॑णन्ति॒ राध॑: । य॒दा ते॒ मर्तो॒ अनु॒ भोग॒मान॒ड्वसो॒ दधा॑नो म॒तिभि॑: सुजात ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imā agne matayas tubhyaṁ jātā gobhir aśvair abhi gṛṇanti rādhaḥ | yadā te marto anu bhogam ānaḍ vaso dadhāno matibhiḥ sujāta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒माः । अ॒ग्ने॒ । म॒तयः॑ । तुभ्य॑म् । जा॒ताः । गोभिः॑ । अश्वैः॑ । अ॒भि । गृ॒ण॒न्ति॒ । राधः॑ । य॒दा । ते॒ । मर्तः॑ । अनु॑ । भोग॑म् । आन॑ट् । वसो॒ इति॑ । दधा॑नः । म॒तिऽभिः॑ । सु॒ऽजा॒त॒ ॥ १०.७.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:7» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (इमाः-मतयः) ये मनुष्यप्रजाएँ (तुभ्यम्) तेरे लिये (गोभिः-अश्वैः-जाताः) इन्द्रियों आशुगामी पवित्र अन्तःकरणों-मन, बुद्धि, चित्त अहंकारों से सुसम्पन्न हुए (राधः-अभिगृणन्ति) आराधनीय स्तुत्यवचन को पुनः-पुनः कहते-जपते हैं (यदा ते मर्तः) जब तेरे उपासक जन (भोगम्-अनु-आनट्) आनन्दरस के साथ व्याप्त है (वसो) हे बसानेवाले (सुजात मतिभिः-दधानः) हे सुप्रसिद्ध परमात्मन् ! हम उपासक प्रजाओं द्वारा धारण किया-गया उपासना में लाया हुआ तू हमें प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो जन संयत इन्द्रियों और पवित्र अन्तःकरणों से सम्पन्न होकर परमात्मा के लिये आराधनीय स्तुतिवचन समर्पित करते हैं, उन ऐसे जनों द्वारा वह साक्षात् किया जाता है, ऐसे जन ही उसके आनन्दरस में विभोर होते हैं ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुस्मरण पूर्वक 'प्रकृति पदार्थ प्रयोग'

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (इमाः मतयः) = ये मेरी बुद्धियाँ (तुभ्यम्) = आपके लिए अर्थात् आपके दर्शन के लिए (जाता:) = विकसित हो गई हैं। प्रभु का दर्शन इन बुद्धियों से ही तो होना है 'दृश्यते त्वग्र्या बुद्धया'। इस संसार में विचारशील पुरुष (गोभिः) = ज्ञानेन्द्रियों से तथा (अश्वैः) = कर्मेन्द्रियों से (राधः) = सब कार्यों के साधक आपका ही [राध्- असुन् नपुंसक] (अभिगृणन्ति) = स्तवन करते हैं। 'गमयन्ति अर्थान् इति गाव:' इस व्युत्पत्ति से 'गौ: ' ज्ञानेन्द्रियों का वाचक है, तथा 'अश्रुव ते कर्मसु ' इस व्युत्पत्ति से 'अश्व' शब्द कर्मेन्द्रियों का ज्ञान की वाणियों का स्वाध्याय यह ज्ञानेन्द्रियों से प्रभु का पूजन है, तथा यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहना कर्मेन्द्रियों से प्रभु-पूजन है। (यदा) = जब (मर्तः) = मनुष्य (ते अनु) = तेरे स्मरण के पश्चात् (भोगम्) = भोग्य पदार्थों को आनट् प्राप्त करता है व भोगता है तो वह पुरुष हे (वसो) = उत्तम निवास के देनेवाले प्रभो ! (सुजात) = उत्तम विकास वाले प्रभो ! (मतिभिः दधान:) = बुद्धियों से धारण किया जाता है। अर्थात् इसकी बुद्धियाँ उन विषयों में न फँसकर अविकृत हों। बनी रहती हैं और इसका धारण करनेवाली होती हैं । प्रभु को भूलकर जब हम इन सांसारिक विषयों में जाते हैं तो उनमें प्रायः आसक्त हो जाते हैं । परिणामतः हमारी बुद्धि भी वासना के पर्दे से आवृत होकर मन्द प्रकाश वाली हो जाती है और यह हमें प्रभु दर्शन तो दूर रहा, संसार का स्वरूप भी ठीक रूप से नहीं दिखा पाती। इस प्रकार यह बुद्धि उस समय हमारा धारण नहीं कर रही होती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वेद के 'उरुशंसों' को सुनकर हमारी बुद्धि ठीक रूप में विकसित होती है और हमें प्रभुदर्शन के योग्य बनाती है, यह हमारा ठीक रूप में धारण करती है ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (इमाः-मतयः) एताः-मनुष्यप्रजाः-उपासकजनाः “प्रजा वै मतयः” [तै० आ० ५।६।८] (तुभ्यम्) त्वदर्थम् (गोभिः-अश्वैः-जाताः) इन्द्रियैराशुगमनशीलैर्मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारैः सुसम्पन्नाः (राधः-अभिगृणन्ति) राधनीयं स्तुत्यं वचनं स्तुवन्ति (यदा ते मर्तः) यदा तव मनुष्यः-उपासक-जनः (भोगम्-अनु-आनट्) आनन्दरसेन सह व्याप्नोति (वसो) हे वासयितः ! (सुजात मतिभिः-दधानः) हे सुप्रसिद्ध परमात्मन् ! अस्माभिरुपासकप्रजाभिर्धार्यमाणः सन् प्राप्तो भव ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, Spirit of life and giver of light, these hymns of adoration spontaneously arisen in praise of your glory, with all our mind and senses, celebrate your gifts of success and achievement when, O shelter home of life and giver of wealth, the mortal receives his reward according to your law, bears and manages it with his mind and senses in order and feels the divine awareness vibrating in the soul.