प्रभुस्मरण पूर्वक 'प्रकृति पदार्थ प्रयोग'
पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (इमाः मतयः) = ये मेरी बुद्धियाँ (तुभ्यम्) = आपके लिए अर्थात् आपके दर्शन के लिए (जाता:) = विकसित हो गई हैं। प्रभु का दर्शन इन बुद्धियों से ही तो होना है 'दृश्यते त्वग्र्या बुद्धया'। इस संसार में विचारशील पुरुष (गोभिः) = ज्ञानेन्द्रियों से तथा (अश्वैः) = कर्मेन्द्रियों से (राधः) = सब कार्यों के साधक आपका ही [राध्- असुन् नपुंसक] (अभिगृणन्ति) = स्तवन करते हैं। 'गमयन्ति अर्थान् इति गाव:' इस व्युत्पत्ति से 'गौ: ' ज्ञानेन्द्रियों का वाचक है, तथा 'अश्रुव ते कर्मसु ' इस व्युत्पत्ति से 'अश्व' शब्द कर्मेन्द्रियों का ज्ञान की वाणियों का स्वाध्याय यह ज्ञानेन्द्रियों से प्रभु का पूजन है, तथा यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहना कर्मेन्द्रियों से प्रभु-पूजन है। (यदा) = जब (मर्तः) = मनुष्य (ते अनु) = तेरे स्मरण के पश्चात् (भोगम्) = भोग्य पदार्थों को आनट् प्राप्त करता है व भोगता है तो वह पुरुष हे (वसो) = उत्तम निवास के देनेवाले प्रभो ! (सुजात) = उत्तम विकास वाले प्रभो ! (मतिभिः दधान:) = बुद्धियों से धारण किया जाता है। अर्थात् इसकी बुद्धियाँ उन विषयों में न फँसकर अविकृत हों। बनी रहती हैं और इसका धारण करनेवाली होती हैं । प्रभु को भूलकर जब हम इन सांसारिक विषयों में जाते हैं तो उनमें प्रायः आसक्त हो जाते हैं । परिणामतः हमारी बुद्धि भी वासना के पर्दे से आवृत होकर मन्द प्रकाश वाली हो जाती है और यह हमें प्रभु दर्शन तो दूर रहा, संसार का स्वरूप भी ठीक रूप से नहीं दिखा पाती। इस प्रकार यह बुद्धि उस समय हमारा धारण नहीं कर रही होती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वेद के 'उरुशंसों' को सुनकर हमारी बुद्धि ठीक रूप में विकसित होती है और हमें प्रभुदर्शन के योग्य बनाती है, यह हमारा ठीक रूप में धारण करती है ।