पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (नः) = हमें (दिवः) = द्युलोक के दृष्टिकोण से तथा (पृथिव्याः) = पृथिवी के दृष्टिकोण से (स्वस्ति) -= उत्तम स्थिति प्राप्त हो । द्युलोक ही यहाँ शरीर में मस्तिष्क है, पृथिवी यह स्थूल शरीर है। हमारा मस्तिष्क भी उच्च स्थिति में हो और हमारा यह शरीर भी पूर्ण नीरोग हो । हे (देव) = सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले प्रभो ! (यजथाय) = यज्ञशील के लिये (विश्वायुः धेहि) = पूर्ण जीवन को धारण करिये। यज्ञशील पुरुष के 'शरीर, मन व मस्तिष्क' सभी बड़े सुन्दर होते हैं। और इनके सुन्दर होने पर हमारी यज्ञ की शक्ति बढ़ती है। हे (दस्म) = काम-क्रोधादि सब शत्रुओं को नष्ट करनेवाले प्रभो ! हम (तव प्रकेतैः) = आप के प्रकृष्ट ज्ञानों से (सचेमहि) = सम्पृक्त हों । हमें सब उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त हों । हे (देव) = सब दिव्यगुणों के पुञ्ज व सब ज्ञानों से दीप्त प्रभो! आप (उरुभिः शंसै:) = विशाल शंसनों के द्वारा, हमारे हृदयों को उदार व विशाल बनानेवाली प्रेरणाओं के द्वारा (नः उरुष्य) = हमारा रक्षण कीजिए। वेद के सब उपदेश हमें बड़ा उदार बनानेवाले हैं, उनके अनुसार 'अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते संभ्रातरो वावृधुः सौभगाय ' = न कोई छोटा है न बड़ा, सब भाई हैं और उन्हें सौभाग्य के लिए बढ़ना है । 'भूमिः माता पुत्रोहं पृथिव्याः ' 'यह भूमि ही मेरी माता है, मैं पृथिवी का पुत्र हूँ' ये भावना हमें देश की संकुचित सीमा से भी ऊपर उठानेवाली है । 'अयुतोहं ' ' मैं सब के साथ हूँ, अपृथक् हूँ' यह भाव हमें सभी में एकत्व दर्शन करानेवाला
भावार्थभाषाः - भावार्थ–हमारा मस्तिष्क व शरीर स्वस्थ हो । पूर्ण जीवन वाले होकर हम यज्ञशील प्रभु के ज्ञान को प्राप्त करें, उदार बनें है ।