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य॒दा व॒लस्य॒ पीय॑तो॒ जसुं॒ भेद्बृह॒स्पति॑रग्नि॒तपो॑भिर॒र्कैः । द॒द्भिर्न जि॒ह्वा परि॑विष्ट॒माद॑दा॒विर्नि॒धीँर॑कृणोदु॒स्रिया॑णाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yadā valasya pīyato jasum bhed bṛhaspatir agnitapobhir arkaiḥ | dadbhir na jihvā pariviṣṭam ādad āvir nidhīm̐r akṛṇod usriyāṇām ||

पद पाठ

य॒दा । व॒लस्य॑ । पीय॑तः । जसु॑म् । भेत् । बृह॒स्पतिः॑ । अ॒ग्नि॒तपः॑ऽभिः । अ॒र्कैः । द॒त्ऽभिः । न । जि॒ह्वा । परि॑ऽविष्टम् । आद॑त् । आ॒विः । नि॒धीन् । अ॒कृ॒णो॒त् । उ॒स्रिया॑णाम् ॥ १०.६८.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:68» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) महान् ज्ञान का पालक परमात्मा (यदा पीयतः-वलस्य-जसुम्) जब हिंसक आवरक अज्ञान के प्रयत्न-प्रभाव को (अग्नितपोभिः-अर्कैः) अग्नितापों के समान वेदमन्त्रों से (भेत्) छिन्न-भिन्न करता है, तब (दद्भिः परिविष्टं जिह्वा-आदत्) दाँतों से परिपिष्ट-चबाये हुए अन्न को जैसे जिह्वा भक्षण करती है, पुनः (उस्रियाणां निधीन्) प्रकट होती हुई वाणियों की निधियों-विद्याविषयों को (आविः-कृणोति) शिष्यों में आविष्कृत करता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अज्ञान के आवरक बल को नष्ट करने के हेतु वेदमन्त्रों से ज्ञान को फैलाता है, जिन मन्त्रों में ज्ञान के कोष निहित हैं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान प्राप्ति का उपदेश

पदार्थान्वयभाषाः - वेदवाणी का पालक ज्ञानी पुरुष नाशकारी अज्ञान के विनाशक प्रभाव को छिन्न-भिन्न कर, अग्नि के तुल्य प्रकाशवाले (अर्कैः) = अर्चनायोग्य वेद मन्त्रों द्वारा ही (परि- विष्टम्) = सर्वव्यापक प्रभु का (आदत्) = ग्रहण करे, उसका ज्ञान प्राप्त करे, और (उस्त्रियाणां निधीन्) = वाणियों के परमविधि रूप (अकृणोत्) = नाना शिष्यों को वेदनिधि बनावे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - आचार्य शिष्यों को वेदवित् बनावे ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) महतो ज्ञानस्य पालकः परमात्मा (यदा पीयतः-वलस्य जसुम्) यदा हिंसतः-आवरकाज्ञानस्य प्रयत्नं प्रभावम् (अग्नितपोभिः-अर्कैः) अग्नितापैरिव मन्त्रैः (भेत्) भिनत्ति, तदा (दद्भिः परिविष्टं जिह्वा-आदत्) दन्तैः “दन्तस्य ददादेशः” परिपिष्टमन्नम् ‘पकारस्य वकारश्छान्दसः’ यथा जिह्वा भक्षयति, पुनः (उस्रियाणां निधीन्-आविः-कृणोत्) उस्रवन्तीनां वाचां निधीन् विद्याविषयानाविष्करोति शिष्येषु ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When Brhaspati with the flames of fire and rays of the light of his creative will breaks through the darkness of nescience covering the primeval potential existence and takes it over as the tongue takes over the food crushed by teeth, then he opens up and reveals the vast reservoir of his energies of the dynamics of creative nature.