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अप॒ ज्योति॑षा॒ तमो॑ अ॒न्तरि॑क्षादु॒द्नः शीपा॑लमिव॒ वात॑ आजत् । बृह॒स्पति॑रनु॒मृश्या॑ व॒लस्या॒भ्रमि॑व॒ वात॒ आ च॑क्र॒ आ गाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apa jyotiṣā tamo antarikṣād udnaḥ śīpālam iva vāta ājat | bṛhaspatir anumṛśyā valasyābhram iva vāta ā cakra ā gāḥ ||

पद पाठ

अप॑ । ज्योति॑षा । तमः॑ । अ॒न्तरि॑क्षात् । उ॒द्नः । शीपा॑लम्ऽइव । वातः॑ । आ॒ज॒त् । बृह॒स्पतिः॑ । अ॒नु॒ऽमृश्य॑ । व॒लस्य॑ । अ॒भ्रम्ऽइ॑व । वातः॑ । आ । च॒क्रे॒ । आ । गाः ॥ १०.६८.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:68» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ज्योतिषा-अन्तरिक्षात्-तमः-अप-आजत्) जैसे सूर्य अपने प्रकाश के द्वारा आकाश से अन्धकार को दूर हटाता है, तथा (वातः-उद्गः-शीपालम्-इव) प्रबल वायु जैसे पानी के शैवाल-काई को दूर हटाता है-पृथक् करता है, वैसे ही (बृहस्पतिः) महान् ब्रह्माण्ड का पालक वेद का स्वामी परमात्मा (वलस्य-अनुमृश्य) आवरक अज्ञान के भेदों-रहस्यों और स्थानों को विचार कर (वातः-अभ्रम्-इव-अप) प्रबल वायु जैसे बादलों के समूह को छिन्न-भिन्न कर देता है या नीचे की ओर प्रेरित करता है, वैसे ही (गाः-आ चक्रे) योग्य पात्रों में वेदवाणियों को विद्याओं को प्रकाशित करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य आकाशस्थ अन्धकार को हटाता है, जैसे प्रबल वायु जल के ऊपर से शैवाल-काई को दूर करता है और मेघों से जल को बरसाता है, ऐसे ही परमात्मा तथा वेद का विद्वान् वेदज्ञान द्वारा लोगों के अज्ञान अन्धकार को हटाता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अज्ञान के नाश का उपदेश

पदार्थान्वयभाषाः - जिस प्रकार सूर्य (अन्तरिक्षात्) = अन्तरिक्ष से (ज्योतिषा) = प्रकाश द्वारा (तमः) = अन्धकार को (अप आजत्) = दूर करता है और जिस प्रकार (वातः) = तीव्र वायु (उद्नः) = जल के पृष्ठ पर से (शीपालम् इव) = सेवार या काई के आवरण को दूर करता है और जिस प्रकार (वातः) = वेगवाला वायु (अभ्रम् इव अप) = मेघ को दूर करता है, उसी प्रकार गुरु (ज्योतिषा) = ज्ञान के प्रकाश से (अन्तरिक्षात्) = अपने शासन में स्थित शिष्य से (तमः) = अज्ञानान्धकार को (अप आजत्) = दूर करता है और (बृहस्पतिः) = ज्ञानवाणी का पालक गुरु बलस्य आवरणकारी अज्ञान की मात्रा का (अनु-मृश्य) = बलाबल विचार कर तदनुसार (आ चक्रे) = वेदवाणियों का उपदेश करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गुरु शिष्य के अज्ञानावरण को हटाकर ज्ञान से प्रकाशित करता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ज्योतिषा-अन्तरिक्षात्-तमः-अप-आजत्) यथा सूर्यः ‘लुप्तोपमालङ्कारः’ स्वप्रकाशेन आकाशादन्धकारमपगमयति “अज गतिक्षेपणयोः” [भ्वादिः] (वातः-उद्गः-शीपालम्-इव-‘अप-आजत्’) प्रबलो वायुः उदकस्य जलाशयस्य शीपालं शेवालं दूरीकरोति “शेवालं शेपालम्” [उणा० ४।३८] ‘शीङ् धातोश्छान्दसः पालन् प्रत्ययः’ तथैव (बृहस्पतिः) महतो ब्रह्माण्डस्य पालकः वेदस्य स्वामी परमात्मा (वलस्य-अनुमृश्य) आवरकस्याज्ञानस्य भेदान् स्थानानि वा विचार्य (वातः-अभ्रम्-इव-अप) प्रबलवायुर्यथा मेघमपगमयति नीचैः प्रेरयति तद्वत् (गाः-आ चक्रे) योग्येषु मन्त्रवाचो विद्याः-वा प्रकाशयति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As the sun removes darkness with light from the middle regions, as the wind removes the cover of moss and grass from the surface of water, so does Brhaspati, lord of the expansive universe, with deep thought, remove the cover of the darkness of nescience and sets in motion the dynamics of nature’s creativity in circuits of energy as the motions of the wind.