पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अभ्रियाय) = [अभ्रेषु भवाय] द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में होनेवाले बादलों के स्थान में होनेवाले, अर्थात् सदा अन्तरिक्ष में, मध्यमार्ग में चलनेवाले बृहस्पति के लिये (इदं नमः अकर्म) = इस नमस्कार को करते हैं । ऐसे व्यक्ति का, जो अति को छोड़कर सदा मध्यमार्ग को अपनाता है, हम सत्कार करते हैं । (यः) = जो बृहस्पति (पूर्वी:) = जीवन का पूरण करनेवाले ऋचाओं को (अनु आनोनवीति) = प्रतिदिन खूब ही उच्चारण करता है। इन ऋचाओं का उच्चारण करता हुआ उनके अनुसार जीवन बिताने का प्रयत्न करता है। [२] (स बृहस्पतिः) = वह ज्ञान का रक्षक व्यक्ति (नः) = हमारे में से (हि) = निश्चयपूर्वक (गोभिः) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियों के साथ (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (धातू) = धारण करता है । (सः) = वह (अश्वैः) = उत्तम कर्मेन्द्रियों के साथ उत्तम जीवनवाला होता है । (स) = वह (वीरेभिः) = वीर - सन्तानों के साथ सुन्दर जीवनवाला होता है । (स नृभिः) = वह उत्तम नर मनुष्यों के साथ, उत्तम मनुष्यों की मित्रता में प्रशस्त जीवनवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मध्यमार्ग में चलें, ऋचाओं का उच्चारण करते हुए तदनुकूल जीवनवाले हों । हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ प्रशस्त हों । सन्तान वीर हों, साथी प्रगतिशील हों । सूक्त का प्रारम्भ बृहस्पति की इस आराधना से हुआ था कि [क] शक्ति वृद्धि रक्षण के द्वारा हमारे आयुष्य की वृद्धि हो, [ख] हमारी इन्द्रियाँ सशक्त बनी रहें, [ग] जीवन उल्लासमय हो, [१] समाप्ति पर यही भाव है कि बृहस्पति सदा मध्यमार्ग में चलता हुआ प्रशस्त इन्द्रियोंवाला होता है, वीर सन्तानों को प्राप्त करता है, इसके साथी भी प्रगतिशील होते हैं, [१५] इस प्रकार यह 'सुमित्र' = उत्तम मित्रोंवाला व उत्तमता से रोगों व पापों से अपने को बचानेवाला होता है [प्रमीतेः त्रायते] तथा 'वाथ्र्यश्व' = संयम रज्जु से बद्ध इन्द्रियाश्वोंवाला होता है। यह 'सुमित्र वाध्यश्व' निम्न प्रकार से जीवन को बिताता है-