पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पितरः) = रक्षणात्मक कर्मों में प्रवृत्त होनेवाले लोग (द्याम्) = अपने मस्तिष्क रूप द्युलोक को (नक्षत्रेभिः) = विज्ञान के नक्षत्रों से (अभि अपिंशन्) = सर्वतः दीप्त करते हैं, सुशोभित करते हैं, (न) = उसी प्रकार जैसे कि (श्यावम्) = गतिशील, खूब तीव्र गतिवाले (अश्वम्) = घोड़े को (कृशनेभिः) = सुवर्ण के बने आभूषणों से अलंकृत करते हैं, इसकी काठी आदि को स्वर्ण से मण्डित करके इसकी शोभा को बढ़ाते हैं । [२] ये पितर अपने जीवनों में (रात्र्याम्) = रात्रि के साथ ही (तमः) = तमोगुण व अन्धकार को (अदधुः) = धारण करते हैं, उस समय ये (सुषुप्ति) = में होते हैं और तमोगुण की प्रधानता के कारण गाढ़निद्रा का अनुभव करते हैं । (अहन्) = दिन में ये (ज्योतिः) = प्रकाश को धारण करते हैं। इस समय सत्त्वगुण की प्राधनता के कारण इनके सब कर्म सात्त्विक होते हैं। और ये सारे दिन को पूर्ण चेतनता के साथ यज्ञादि उत्तम कर्मों में बिताते हैं । इस प्रकार ये रात्रि को अपने लिये रमयित्री तथा दिन को (अहन्) = एक भी क्षण जिसका नष्ट नहीं किया गया [अ+हन्] ऐसा बनाते हैं । [३] (बृहस्पतिः) = उल्लिखित प्रकार से जीवन को बनाता हुआ बृहस्पति (अद्रिम्) = वासना पर्वत को (भिनद्) = विदीर्ण करता है और (गाः) = द्युलोक को विज्ञान क्षेत्रों से दीप्त करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम रात्रि में सुषुप्ति का आनन्द लें, दिन में ज्योति का । वासना को नष्ट करके इन्द्रियों को सशक्त बनायें ।