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अ॒भि श्या॒वं न कृश॑नेभि॒रश्वं॒ नक्ष॑त्रेभिः पि॒तरो॒ द्याम॑पिंशन् । रात्र्यां॒ तमो॒ अद॑धु॒र्ज्योति॒रह॒न्बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ वि॒दद्गाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi śyāvaṁ na kṛśanebhir aśvaṁ nakṣatrebhiḥ pitaro dyām apiṁśan | rātryāṁ tamo adadhur jyotir ahan bṛhaspatir bhinad adriṁ vidad gāḥ ||

पद पाठ

अ॒भि । श्या॒वम् । न । कृश॑नेभिः । अश्व॑म् । नक्ष॑त्रेभिः । पि॒तरः॑ । द्याम् । अ॒पिं॒श॒न् । रात्र्या॑म् । तमः॑ । अद॑धुः । ज्योतिः॑ । अह॑न् । बृह॒स्पतिः॑ । भि॒नत् । अद्रि॑म् । वि॒दत् । गाः ॥ १०.६८.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:68» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्यावम्-अश्वं न कृशनेभिः) जैसे श्याववर्ण-उज्ज्वलवर्णयुक्त अश्व को सुनहरी आभूषणों से भूषित करते हैं (द्यां नक्षत्रैः पितरः-अभि-अपिंशन्) सूर्यरश्मियाँ जैसे द्युलोक को चमकाती हैं (रात्र्यां तमः) जिन स्थलों में रात्रि को अन्धकार होता है (अहन्-ज्योतिः-अदधुः) वे दिन में प्रकाश को धारण करते हैं, ऐसे ही (बृहस्पतिः अद्रिं भिनत्) वेदपालक परमात्मा ज्ञानाद्रि-वाणी के प्रेरक वेद को विकसित करता है, वेदवाणियों को जनाता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - उज्ज्वल घोड़े को सुनहरी भूषणों से लोक में जैसे सजाते हैं या रात्रि में गगन-मण्डल को नक्षत्र में प्रकाश देकर रश्मियाँ चमकती हैं-विकसित करती हैं, अथवा रात्रि के अन्धकारवाले स्थल को सूर्यकिरणें जैसे चमका देती हैं, ऐसे ही परम ऋषियों के आत्मा में वेदज्ञान को प्रकाशित करके परमात्मा चमका देता है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभि अपिंशन्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पितरः) = रक्षणात्मक कर्मों में प्रवृत्त होनेवाले लोग (द्याम्) = अपने मस्तिष्क रूप द्युलोक को (नक्षत्रेभिः) = विज्ञान के नक्षत्रों से (अभि अपिंशन्) = सर्वतः दीप्त करते हैं, सुशोभित करते हैं, (न) = उसी प्रकार जैसे कि (श्यावम्) = गतिशील, खूब तीव्र गतिवाले (अश्वम्) = घोड़े को (कृशनेभिः) = सुवर्ण के बने आभूषणों से अलंकृत करते हैं, इसकी काठी आदि को स्वर्ण से मण्डित करके इसकी शोभा को बढ़ाते हैं । [२] ये पितर अपने जीवनों में (रात्र्याम्) = रात्रि के साथ ही (तमः) = तमोगुण व अन्धकार को (अदधुः) = धारण करते हैं, उस समय ये (सुषुप्ति) = में होते हैं और तमोगुण की प्रधानता के कारण गाढ़निद्रा का अनुभव करते हैं । (अहन्) = दिन में ये (ज्योतिः) = प्रकाश को धारण करते हैं। इस समय सत्त्वगुण की प्राधनता के कारण इनके सब कर्म सात्त्विक होते हैं। और ये सारे दिन को पूर्ण चेतनता के साथ यज्ञादि उत्तम कर्मों में बिताते हैं । इस प्रकार ये रात्रि को अपने लिये रमयित्री तथा दिन को (अहन्) = एक भी क्षण जिसका नष्ट नहीं किया गया [अ+हन्] ऐसा बनाते हैं । [३] (बृहस्पतिः) = उल्लिखित प्रकार से जीवन को बनाता हुआ बृहस्पति (अद्रिम्) = वासना पर्वत को (भिनद्) = विदीर्ण करता है और (गाः) = द्युलोक को विज्ञान क्षेत्रों से दीप्त करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम रात्रि में सुषुप्ति का आनन्द लें, दिन में ज्योति का । वासना को नष्ट करके इन्द्रियों को सशक्त बनायें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्यावम्-अश्वं न कृशनेभिः) यथा श्याववर्णम्-उज्ज्वलवर्णयुक्तमश्वं हिरण्यैराभूषणैः “कृशनं हिरण्यनाम” [निघ० १।२] रूपयन्ति-अलङ्कुर्वन्ति भूषयन्ति (द्यां नक्षत्रैः पितरः-अभि-अपिंशन्) सूर्यरश्मयो यथा नक्षत्रैर्द्युलोकं भूषयन्ति (रात्र्यां तमः) रात्रौ येषु स्थलेषु तमो भवति (अहन् ज्योतिः-अदधुः) ते दिने प्रकाशं धारयन्ति, एवं (बृहस्पतिः-अद्रिं भिनत्-गाः-विदत्) वेदपालकः परमात्मा ज्ञानाद्रिं वाक्प्रेरकं वेदम् “अद्रिरसि श्लोककृत्” [काठ० १।५] उद्भिनत्ति विकासयति वाचो वेदयति ज्ञापयति ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a dark horse adorned with golden trappings, the rays of light adorn the heavens with stars.$Brhaspati vests darkness in the night and light in the day, breaks the cloud, releases the light and showers recovering the light of existence from the night of annihilation, and enlightens the heart of darkness with revelations of the light of divinity.