पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शिवाभिः) = कल्याणी (मतिभिः) = मतियों से हम (तम्) = उस प्रभु का (वर्धयन्तः) = वर्धन करते हुए (अनुमदेम) = उसकी अनुकूलता में हर्ष का अनुभव करें। हम अपनी मति को सदा शुभ बनाये रखें, वस्तुतः मति का शुभ बनाये रखना ही प्रभु का सर्वोत्तम आराधन है, संसार में किसी के अशुभ का विचार न करना । [२] उस प्रभु का हम वर्धन करें जो कि (सधस्थे) = जीवात्मा और परमात्मा के साथ-साथ ठहरने के स्थान 'हृदय' में (सिंहं इव) = शेर की तरह (नानदतम्) = गर्जन कर रहे हैं । हृदयस्थरूपेण प्रभु प्रेरणा दे रहे हैं, 'कनिक्रदत' वे गर्जना कर रहे हैं। सिंह गर्जना को सुनकर जैसे खरगोश मृग आदि पशु भाग खड़े होते हैं, इसी प्रकार प्रभु के नाम को सुनकर वासनारूप पशु भाग जाते हैं। [३] (बृहस्पतिम्) = ज्ञान के स्वामी (वृषणम्) = शक्तिशाली प्रभु को, शूरसातौ शूरों से सेवनीय (भरेभरे) = प्रत्येक संग्राम में (जिष्णुम्) = जो विजय को करनेवाले हैं, उस प्रभु के (अनुमदेम) = अनुकूलता में हर्ष का अनुभव करें। प्रभु ज्ञानी हैं और शक्तिशाली हैं, इसी से वे विजयशील हैं। हमारे संग्रामों में भी हमें विजय प्रभु के कारण ही प्राप्त होती है। ऐसा समझने पर हमें अहंकार नहीं होता और वास्तविक हर्ष प्राप्त होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शुभ मति के द्वारा हम प्रभु का वर्धन करें। वे प्रभु हमें निरन्तर प्रेरणा दे रहे हैं । प्रभु ज्ञानी व शक्तिशाली हैं, इसीसे विजयी हैं, हम प्रभु की अनुकूलता में हर्ष का अनुभव करें।