पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'वल' वृत्र का ही दूसरा नाम है, यह ज्ञान पर परदे के रूप में [वल - veil] आया रहता है । इस (वृत्र) = काम के प्रबल होने पर ज्ञानेन्द्रियाँ अपना कार्य ठीक से नहीं करती। मानो यह वृत्र उन्हें चुरा ले जाता है और कहीं गुफा में छिपा रखता है। यहाँ इसी भाव को 'दुधानां रक्षितारम्' इन शब्दों से कहा गया है। ज्ञान का दोहन करनेवाली ज्ञानेन्द्रियाँ 'दुघ' हैं, 'वल' उनको छिपा रखता है, सो इनका रक्षिता कहलाया है । 'इन्द्र' - जितेन्द्रिय पुरुष वल को नष्ट करके इन इन्द्रियरूप गौओं को फिर वापिस ले आता है। वल के नष्ट करने का साधन 'करेण+रवेण' है, कर्मशील बनना और प्रभु के नामों का उच्चारण करना। क्रियाशीलता के अभाव में अशुभ- वृत्तियाँ पनपती हैं और प्रभु विस्मरण से उन कर्मों का गर्व हो जाने का भय बना रहता है। अहंकार भी 'वल' का ही दूसरा रूप है यह भी ज्ञान को नष्ट करनेवाला है । (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (दुघानाम्) = ज्ञानरूप दुग्ध का दोहन करनेवाली इन्द्रियरूप गौवें के (रक्षितारम्) = चुराकर कहीं गुफा में रखनेवाले (वलम्) = वृत्रासुर को (करेण इव रवेण) = जैसे हाथ से उसी प्रकार रव से (विचकर्त) = काट डालता है। 'कर' का भाव क्रियाशीलता है, रव का नामोच्चारण क्रियाशील बनकर प्रभु नाम-स्मरण करता हुआ यह वासना को विनष्ट करता है और इस प्रकार इन्द्रियों का रक्षण करनेवाला बनता है । [२] यह (स्वेदाञ्जिभि:) = [अञ्जि = आभरण] पसीने रूप आभूषणों से (आशिरम्) = [ श्रियं = आश्रयणं] श्री को (इच्छमानः) = चाहता हुआ (पणिम्) = लोभवृत्ति को [वणिये की वृत्ति को ] (अरोदयत्) = रुलाता है और (गाः) = ज्ञानेन्द्रिय रूप गौवों को (अयुष्णात्) = [ आजहार सा० ] फिर वापिस ले आता है । लोभवृत्ति में मनुष्य कम से कम श्रम से अधिक से अधिक धन को लेना चाहता है, इस लोभ से उसकी बुद्धि मलिन हो जाती है इसीलिए यहाँ मन्त्र का ऋषि 'अयास्य' गहरे पसीने की कमाई को ही चाहता है, स्वेद उसका आभूषण ही बन जाता है। इस प्रकार यह लोभवृत्ति को नष्ट कर देता है, मानो उसे रुलाता है। श्रम से ही धन की कामना करता हुआ यह अपनी इन्द्रियों को स्वस्थ रखता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वासना हमारी इन्द्रियरूप गौवों को चुरा लेती है। श्रम से ही धनार्जन की इच्छा करते हुए हम ज्ञानेन्द्रियों को स्वस्थ रखते हैं।