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स॒त्यामा॒शिषं॑ कृणुता वयो॒धै की॒रिं चि॒द्ध्यव॑थ॒ स्वेभि॒रेवै॑: । प॒श्चा मृधो॒ अप॑ भवन्तु॒ विश्वा॒स्तद्रो॑दसी शृणुतं विश्वमि॒न्वे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

satyām āśiṣaṁ kṛṇutā vayodhai kīriṁ cid dhy avatha svebhir evaiḥ | paścā mṛdho apa bhavantu viśvās tad rodasī śṛṇutaṁ viśvaminve ||

पद पाठ

स॒त्याम् । आ॒ऽशिष॑म् । कृ॒णु॒त॒ । व॒यः॒ऽधै । की॒रिम् । चि॒त् । हि । अव॑थ । स्वेभिः॑ । एवैः॑ । प॒श्चा । मृधः॑ । अप॑ । भ॒व॒न्तु॒ । विश्वाः॑ । तत् । रो॒द॒सी॒ इति॑ । शृ॒णु॒त॒म् । वि॒श्व॒मि॒न्वे इति॑ वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वे ॥ १०.६७.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:67» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्याम्-आशिषं कृणुत) हे राज्याधिकारियों ! तुम प्रजा की प्रार्थना को, कामना को सफल करो (कीरिं चित्-हि वयोधै स्वेभिः-एवैः-अवथ) स्तुति करनेवाले प्रशंसक, युक्तोपदेष्टा को भी अवश्य अन्नविधानार्थ अपने रक्षणप्रकारों से रक्षित करो (विश्वाः-मृधः पश्चा अप भवन्तु) सब हिंसक आपत्तियाँ पीछे ही अर्थात् पृथक् ही रह जावें (विश्वमिन्वे रोदसी शृणुतम्) सब प्रणिमात्र को तृप्त करनेवाली राजसभा और सेना प्रजाजन के वचन को स्वीकार करो ॥११॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषों को चाहिए कि प्रजा की प्रार्थना पर ध्यान दें और सच्चे उपदेष्टा की रक्षा करें। समस्त आपदाओं को राष्ट्र से दूर भगाएँ, प्राणियों की हितसाधिका राजसभा और सेना प्रजा के दुःख दर्द को सुनें ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विद्वान् पुरुषों के कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् पुरुषो! आप लोग (वयोधैः) = दीर्घ जीवन धारण करने के लिये (सत्याम् आशिषं) = सत्य-सत्य आशीर्वाद और सत्य आशा को सफल करो और (स्वेभिः एवैः) = अपने-अपने ज्ञानों और उद्योगों से (कीरिम् चित्) = उपदेष्टा, ज्ञानप्रद वा प्रार्थी पुरुष की (अवथ) = रक्षा करो। (मृधः) = हिंसक दुःखदायी सब आपत्तियें (पश्चा) = पीछे रह जावें, (अप भवन्तु) = और हमसे पृथक् हो जावें । हे (विश्वमिन्वे) = सबको प्रसन्न एवं पुष्ट करनेवाले स्त्री-पुरुषो! हे (रोदसी) = दुष्टों के रुलानेवाले वा दूर करनेवाले सेनापति तथा वैद्य लोगो ! आप (शृणुतम्) = सुनो और तदनुसार कर्त्तव्य पालन रोग करो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-विज्ञजनों के आशीर्वाद से हम दुःखों से तर कर आनन्द को प्राप्त करें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्याम्-आशिषं कृणुत) हे राज्याधिकारिणो ! यूयं प्रार्थनां कामनां सफलां कुरुत (किरिं चित्-हि वयोधै स्वेभिः-एवैः-अवथ) स्तोतारं प्रशंसकं युक्तोपदेष्टारमप्यवश्यमन्नविधानैः स्वै रक्षणैः-रक्षथ (विश्वाः-मृधः-पश्चा-अप भवन्तु) सर्वाः खलु हिंसिका आपदः पश्चादेव पृथग् भवन्तु (विश्वमिन्वे रोदसी शृणुतम्) सर्वप्राणिमात्रं प्रीणयित्र्यौ द्यावापृथिव्याविव राजसभासेने प्रजाजनस्य मम वचनं स्वीकुरुत ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Brhaspati, O leading lights of humanity, for food and energy, good health and age, fulfil the hopes and ambitions of the people and justify your words of purpose to the point of truth without compromise. Protect the cooperator and celebrant with your own power and security. Then let all violence, enmity and sabotage be overcome and cast off totally far away. And may the heaven and earth, givers of universal fulfilment listen to our prayer and adoration.