स्वावेशा- देवगोपा [पृथिवी]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हमारा शरीर पाँचभौतिक होते हुए भी पृथिवी की प्रधानता के कारण 'पार्थिव' कहलाता है। इस पृथिवी देवता से प्रार्थना करते हैं कि यह पृथिवी (प्रपथे) = हमारे प्रकृष्ट मार्ग में चलने पर (इत् हि) = निश्चय से (स्वस्ति) = कल्याण करनेवाली होती है। (श्रेष्ठा) = यह हमारे जीवन को प्रशस्यतम बनाती है । (रेक्णस्वती) = यह हमारे लिये उत्तम धनोंवाली होती है। हम उत्कृष्ट मार्ग पर चलते हैं तो यह मातृभूत पृथिवी हमारे लिये सब आवश्यक तत्त्वों को उपस्थित करती है और हमारा जीवन जहाँ धार्मिक होता है वहाँ धन की दृष्टि से भी उसमें न्यूनता नहीं होती । 'श्रेष्ठा' शब्द 'धर्म' का संकेत करता है और 'रेक्णस्वती' 'धन' का। इस प्रकार यह पृथिवी (या) = जो (अभि) = धर्म व धन दोनों ओर हमें ले चलती है वह (स्वस्ति) = हमारे कल्याण के लिये होती है और वामं एति = उस सब प्रकार से सुन्दर प्रभु की ओर हमें ले चलती है । हमारे जीवनों में जब धर्म व धन का सुन्दर समन्वय होता है तभी हम प्रभु प्राप्ति के अधिकारी होते हैं । [२] (सा) = वह पृथिवी (नः) = हमें (अमा) = घर में निपातु सुरक्षित करे (सा उ) = और वह ही हमें (अरणे) = घर से बाहर भी सुरक्षित करे। यह पृथिवी हमारे लिये (स्वावेशा) = [सु आ विश्] बड़ी उत्तमता से सब आवश्यक तत्त्वों का प्रवेश करानेवाली हो और इन सब आवश्यक तत्त्वों के प्रवेश कराने के साथ (देवगोपा) = हमारे में दिव्यगुणों का रक्षण करनेवाली भवतु हो । शरीर के लिये आवश्यक सब तत्त्वों को प्राप्त कराने से यह हमें 'शारीरिक स्वास्थ्य' देती है और दिव्यगुणों के रक्षण से 'मानस स्वास्थ्य' । पृथिवी से उत्पन्न विविध वानस्पतिक पदार्थ शरीर के लिये सब आवश्यक तत्त्वों का पोषण तो करते ही हैं, ये वानस्पतिक पदार्थ उपयुक्त होने पर हमारी बुद्धि, मन को भी शुद्ध रखते हैं और इस प्रकार हमारे में दिव्यगुणों का विकास होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पृथिवी अनुकूल होकर हमारे जीवन को धर्म व धन से युक्त करती है, यह हमें शारीरिक व मानस स्वास्थ्य प्राप्त कराती है और इस प्रकार प्रभु की ओर ले चलती है।