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उ॒त दा॒सा प॑रि॒विषे॒ स्मद्दि॑ष्टी॒ गोप॑रीणसा । यदु॑स्तु॒र्वश्च॑ मामहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta dāsā pariviṣe smaddiṣṭī goparīṇasā | yadus turvaś ca māmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । दा॒सा । प॒रि॒ऽविषे॑ । स्मद्दि॑ष्टी॒ इति॒ स्मत्ऽदि॑ष्टी । गोऽप॑रीणसा । यदुः॑ । तु॒र्वः । च॒ । मा॒म॒हे॒ ॥ १०.६२.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:62» मन्त्र:10 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:2» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:10


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्मद्दिष्टी) प्रशस्त दर्शनवाले (गोपरीणसा) बहुत गौवोंवाले बहुत विद्या वाणीवाले अध्यापक उपदेशक (दासा) तथा दानी (उत) और (परिविषे) स्नानसेवा के लिये योग्य होओ (यदुः-तुर्वः-च ममहे) यत्नशील और प्रगतिशील जन महत्त्व पाते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - प्रशस्त दर्शनीय बहुत विद्यावाले अध्यापक उपदेशक ज्ञान के दानियों की स्नानादि सेवा और प्रशंसा करनी चाहिए ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यदु और तुर्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और (दासा) = जो प्रभु के भक्त हैं, जो वासनाओं के उपदसन [दसु उपक्षये] क्षय में प्रवृत्त हैं, (स्मद्दिष्टी) = [ कल्याण देशिनौ सा० ] शुभ उपदेशवाले हैं, जो अन्तःस्थित प्रभु की कल्याणी प्रेरणा को प्राप्त करनेवाले हैं, (गोपरीणसा) = इन्द्रियों को चारों ओर से बाँधनेवाले हैं, इधर- उधर विषयों में जाती हुई इन्द्रियों को रोकनेवाले हैं, ये ही (परिविषे) = [to surround to encouuter] शत्रुओं के घेरने के लिये और उनसे मुकाबिला करने के लिये होते हैं । वस्तुतः वासनाओं को जीतने के लिये सर्वोत्तम साधन यही है कि हम प्रभु के दास बनें, उसकी कल्याणी प्रेरणा को सुनें, इन्द्रियों को रोकने का प्रयत्न करें। [२] (यदु:) = [ यतते ] यत्नशील पुरुष (च) = और (तुर्वः) = [तुर्वी हिंसायाम्] वासनाओं का संहार करनेवाला व्यक्ति (मामहे) = प्रभु का पूजन करता है । प्रभु की वस्तुतः पूजा यही है कि हम अकर्मण्य न हों और वासनाओं के शिकार न हों। इस प्रकार यदु और तुर्व बनकर हम प्रभु का पूजन करते हैं। आलसी प्रभु से दूर होता है, क्रियाशील समीप । वासनाओं को जीतनेवाला प्रभु का दर्शन करता है, वासनामय जीवनवाला इन वासनाओं से ही कुचला जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु-भक्त बनें, उसकी कल्याणी प्रेरणा को सुनें, इन्द्रियों को विषयों में जाने से रोकें, यत्नशील हों, वासनाओं का संहार करें। यही सच्चा प्रभु-पूजन है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्मद्दिष्टी) प्रशस्तदर्शनौ “स्मद्दिष्टीन् प्रशस्तदर्शनान्” [ऋ० ६।६३।९ दयानन्दः] (गोपरीणसा) गवां परीणसा बहुभावो यमो बहुगोमन्तौ बहुविद्यावन्तौ-अध्यापकोपदेशकौ “परीणसा बहुनाम” [निघ० ३।१] (दासा) दातारौ “दासृ दाने” [भ्वादि०] “दासं दातारम्” [ऋ० ७।१९।२ दयानन्दः] (उत) अपि तस्य ज्ञानदातुः (परिविषे) स्नान-सेवायै योग्यौ भवतः “विष सेचने” [भ्वादि०] (यदुः-तुर्वः-च ममहे) यत्नशीलः प्रगतिशीलश्च जनौ मह्येते मन्त्रे खल्वेकवचनं प्रत्येकमन्वयात् ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And the giver, the visionary, the prosperous, the industrious and the victorious, all exalt him and feel honoured to serve and support him.