पदार्थान्वयभाषाः - [१] अगस्त्य की स्वसा [= बहिन ] सुबन्धु की माता है। वही प्रस्तुत मन्त्रों की देवता है । अगं अचलं कूटस्थं प्रभुं स्त्यायति [स्त्यै शब्दे ] = अचल प्रभु के नामों का जो उच्चारण करता है वह 'अगस्त्य' है । वह चित्तवृत्ति जो कि प्रभु-स्तवन की ओर झुकती है वही अगस्त्य की स्वसा है, 'सु अस्' = अगस्त्य की स्थिति को उत्तम बनानेवाली है। यह 'अगस्त्य स्वसा' सुबन्धु को जन्म देती है, सुबन्धु, अर्थात् उत्तमता से मन को बाँधनेवाला । हे प्रभो ! आप इन (अगस्त्यस्य नद्भ्यः) = [नन्दपितृभ्य] अगस्त्य के आनन्दित करनेवाले, अगस्त्य के भगिनी पुत्रों, अर्थात् प्रभु- स्तवन की ओर चित्तवृत्ति को लगाकर चित्त के बाँधनेवालों के लिये (रोहिता) = तेजस्वी अथवा प्रादुर्भूत शक्तियोंवाले (सप्ती) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय रूप अश्वों को (युनक्षि) = इस शरीर रूप रथ में जोतते हैं । अर्थात् मनोनिरोध करनेवाले व्यक्तियों को आप उत्तम इन्द्रियाश्वों की प्राप्ति कराते हैं । इन्द्रियों ने तो विषयों का ग्रहण करना ही है, परन्तु यदि वे आत्मवश्य होती हुई विषयों में जाती हैं तो पवित्रता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की वृत्ति भौतिक नहीं बन जाती । [२] इसके विपरीत हे (राजन्) = संसार के शासक प्रभो ! आप (विश्वान्) = सब (अराधसः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों को न सिद्ध करनेवाले (पणीन्) = बणिये की मनोवृत्तिवाले व्यवहारी लोगों को (अभि) = इस लोक व परलोक दोनों के दृष्टिकोण से (नि अक्रमी:) = नीचे कुचल देते हैं। धन का लोभ इन्हें यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होने से रोकता है, सो ये इहलोक से भी जाते हैं, परलोक से भी ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु-स्तवन की ओर चित्तवृत्ति को झुकायेंगे तो हमारे इन्द्रियाश्व उत्तम होंगे। केवल व्यवहारी पुरुष बन जायेंगे तो कुचले जाएँगे ।