वांछित मन्त्र चुनें

आ जनं॑ त्वे॒षसं॑दृशं॒ माही॑नाना॒मुप॑स्तुतम् । अग॑न्म॒ बिभ्र॑तो॒ नम॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā janaṁ tveṣasaṁdṛśam māhīnānām upastutam | aganma bibhrato namaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । जन॑म् । त्वे॒षऽस॑न्दृशम् । माही॑नानाम् । उप॑ऽस्तुतम् । अग॑न्म । बिभ्र॑तः । नमः॑ ॥ १०.६०.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:60» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में राजा को परमात्मा की उपासना करनी चाहिए और योग्य सेनाध्यक्ष मन्त्रियों की नियुक्ति, उन्हें अधिकार प्रदान करना, मनोदोषनिवारक चिकित्सकों को रखना आदि वर्णित है।

पदार्थान्वयभाषाः - (माहीनानाम्) महान् आत्माओं के मध्य में (त्वेषसन्दृशम्) साक्षात् ज्ञानी (उपस्तुतं जनम्) प्रशस्त जन को (नमः-बिभ्रतः-अगन्म) हम उपहार धारण करने के हेतु जाएँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - महात्माओं में जो साक्षात् परमात्मदर्शी तथा उत्तमगुणसम्पन्न है, उसका सत्सङ्ग कुछ उपहार ले जाकर करना चाहिए ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दीप्त-दर्शन, स्तुतिवाला

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नमः बिभ्रतः) = नमस्कार को धारण करते हुए, बद्धाञ्जलि होकर अथवा आदर की भावना को धारण करते हुए हम (आ अगन्म) = सर्वथा प्राप्त हों । (जनम्) = उस मनुष्य को प्राप्त हों जो कि (त्वेषसन्दृशम्) = दीप्त- दर्शनवाला है, जिसका मुख तेजस्विता से दीप्त है तो मस्तिष्क ज्ञान की दीप्ति से उज्ज्वल है। इसके सम्पर्क में आकर हम भी इसी प्रकार बन पायेंगे। हमारा भी शरीर तेजस्वी होगा और मस्तिष्क ज्ञान की दीप्तिवाला बनेगा। [२] हम उस मनुष्य को प्राप्त होते हैं जो कि (माहीनानां उपस्तुतम्) = पूजा के योग्यों के लिये उपगत स्तुतिवाला है, पूजनीयों की पूजा करनेवाला है । वही पुरुष संगतिकरण योग्य है जो कि हृदय में प्रभु की पूजा की भावना से ओत- प्रोत है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उन लोगों को नमस्कृत करें जो तेजस्विता से दीप्त मुखवाले, ज्ञान से उज्ज्वल मस्तिष्कवाले तथा हृदय में पूज्यों की पूजा की वृत्तिवाले हैं। जिससे हमारा भी जीवन इसी प्रकार का बने ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते राज्ञा परमात्मोपासितव्यः, योग्यसेनाध्यक्षस्य मन्त्रिणां च नियुक्तिस्तेभ्योऽधिकारप्रदानं मनोदोषनिवारका विशेषतो चिकित्सका संरक्ष्या इति वर्णितम्।

पदार्थान्वयभाषाः - (माहीनानाम्) महतां महानुभावानां मध्ये “माहिनः महन्नाम” [निघ० ३।३] (त्वेषसन्दृशम्) साक्षाज्ज्ञानिनम्-“न्यायप्रकाशं सम्पश्यति दर्शयति वा” [ऋ० ६।२२।९ दयानन्दः] (उपस्तुतं जनम्) प्रशस्तं जनम् (नमः बिभ्रतः-अगन्म) वयमुपहारं धारयन्तो गच्छेम ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Bearing gifts of homage we come to the man of radiant glory, honoured and celebrated by the greatest of the great.