पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) = परमात्मन्! (अधाहि) = अब ही, अर्थात् गतमन्त्र के अनुसार आप का रक्षण प्राप्त करने पर ही, (मह्ना) = अपनी महिमा से (निषद्या) = हमारे हृदयों में आसीन होकर (सद्यः) = शीघ्र ही (जज्ञानः) = प्रादुर्भूत होते हुए आप (हव्यः) = हमारे से पुकारे जाने योग्य (बभूथ) = होते हैं। जब हम आपके रक्षणों को प्राप्त करते हैं तब अपने हृदयों को निर्मल करके उन्हें आपके बैठने योग्य बनाते हैं। वहाँ हम आपके दर्शन करते हैं, और उसी प्रकार आपको पुकारते हैं जैसे कि एक पुत्र पिता को। (देवास:) = देव वृत्ति के लोग (ते) = आपके (तं केतम् अनु आयन्) = उस ज्ञान के अनुसार गति करते हैं, अर्थात् आपके वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं और उसे जीवन में अनूदित करने का प्रयत्न करते हैं [translate into action] । वस्तुतः जो व्यक्ति इस वेदज्ञान को जीने का प्रयत्न करते हैं वे ही 'देव' बनते हैं । (अधा) = अब, अर्थात् वेद ज्ञान को प्राप्त करने व उसे जीवन में अनूदित करने के बाद ये लोग (प्रथमासः ऊमाः) = प्रथम श्रेणी के रक्षकों के रूप में (अवर्धन्त) = बढ़ते हैं । अर्थात् ये प्रजाओं के उत्तम रक्षक बनते हैं । इनका जीवन अभाव व प्रयोग दोनों [theoretical and practical] में निपुण बनकर प्रजा का अधिक कल्याण सिद्ध कर पाता है। लोग इनके मुखों से बातों को सुनते हैं, उन बातों को ही वे उनके जीवन में देख भी पाते हैं । एवं वे बातें वास्तविक प्रभाव को पैदा करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानी लोग हृदय को पवित्र करके उसे प्रभु का निवास बनाते हैं। प्रभु के ज्ञान के अनुसार चलते हैं और प्रजा को शास्त्रीय व विमाता के ज्ञान देनेवाले बनकर प्रजा का रक्षण करते हैं। सूक्त का प्रारम्भ प्रभु-रक्षण में वृद्धि के प्राप्ति से होता है, [१] हमें उत्कृष्ट ज्ञान की तेजस्विता व क्रियाशीलता प्राप्त होती है, [२] सब दिव्य गुणों को प्राप्त कर के हम 'अरिष्ट-रथ' बनते हैं, [३] शत्रु शोधक बलों से बढ़ते हुए हम सब के साथ मिलजुलकर चलते हैं, [४] उस प्रभु को ही सम्पूर्ण धनों का स्वामी जानते हैं, [५] सब धन उन्हीं में तो संगत हो रहे हैं, [६] इस प्रभु को हम अपने हृदयों में बिठाने का यत्न करते हैं। ऐसा करने पर ही हम उत्तम स्थिति को प्राप्त करेंगे-