पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) = उस परमात्मा को जो (उस्त्राम्) = [भोगानाम् उत्स्राविणं दातारं सा०] सब भोग्य पदार्थों के देनेवाले हैं, (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली हैं, (न रेजमानम्) = कम्पित होनेवाले नहीं हैं, कूटस्थ व निर्विकार है, अर्थात् मनुष्यों की तरह उनकी मित्रता टूट जानेवाली नहीं, (अग्निम्) = जो अग्रेणी हैं, उस प्रभु को (गीर्भिः) = वेद वाणियों के द्वारा तथा (नमोभिः) = नम्रता के द्वारा (आकृणुध्वम्) = अपने अभिमुख करने का प्रयत्न करो, अपनाने के लिये यत्नशील होवो । (यं) = जिस परमात्मा को (विप्रासः) = अपना विशेष रूप से पूरण करनेवाले ज्ञानी लोग (मतिभिः) = मननीय स्तोत्रों के द्वारा (गृणन्ति) = साधना करते हैं, अर्थात् बुद्धिमत्ता से प्रभु का स्तवन करते हुए उसके गुणों को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाते हैं । उस ('जातवेदसम्') = जातवेदस् को वे स्तुत करते हैं, जो सर्वव्यापक है [जाते जाते विद्यते] सर्वज्ञ है [ जातं जातं वेत्ति] तथा सम्पूर्ण धनों को उत्पन्न करनेवाला है [जातं वेदो यस्मात्, वेदस्=wealth] । तथा उस 'सहानां जुह्वम्' की वे स्तुति करते हैं जो शत्रुओं के मर्षण करनेवाले बलों को देनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु को ज्ञान वाणियों व नम्रता से अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। वे प्रभु ही सम्पूर्ण धनों के स्वामी हैं व सब आवश्यक भोग्य पदार्थों को देनेवाले हैं।