पदार्थान्वयभाषाः - गत मन्त्र में वर्णित (शूषेभिः) = शत्रु शोषक बलों से (वृधः) = सदा बढ़नेवाला यह बनता है। वासनाओं का शोषण करके यह सब दृष्टिकोणों से उन्नत होता है। इसकी शरीर की शक्तियों का क्षय नहीं होता, मानस पवित्रता बनी रहती है, और इसका मस्तिष्क खूब उज्ज्वल बनता है। एवं यह इन 'शूषों' से शत्रुओं का शोषण करता हुआ उन्नत ही उन्नत होता चलता है । उन्नत होकर यह (अर्कैः) = अर्चना के साधनभूत मन्त्रों से (जुषाण:) = प्रीति पूर्वक प्रभु का उपासन करता है। यह प्रभु का उपासन ही तो वस्तुतः उस शत्रुशोषक बल को प्राप्त कराता है और उस बल के अभिमान से भी बचाता है । इस प्रकार दिव्य उन्नति के साथ नम्र बना हुआ यह (रघुपत्वा) = [लघुगमन:] शीघ्रगतिवाला, अर्थात् कर्मों में आलस्य शून्य हुआ हुआ देवाँ अच्छा-दिव्यगुणों की ओर जिगाति = जाता है । यह दिव्यगुणों को प्राप्त करता है । मन्द्रः सदा आनन्दमय स्वभाव वाला होता है, (होता) = सदा दानपूर्वक अदन करता है, यज्ञशेष को खाता है और (जुह्वा यजिष्ठ:) = चम्मच से अथवा दान पूर्वक अदन की वृत्ति से उत्तम यष्टा बनता है, इसका जीवन यज्ञशील होता है। इस प्रकार सुन्दर जीवनवाला बनकर यह (संमिश्ल:) = सब के साथ मिलकर चलता है, मिलनसार स्वभाव वाला होता है, औरों के सुख-दुःख में हिस्सा बटाता है । इस प्रकार अग्नि यह प्रगतिशील जीव (देवान्) = दिव्यगुणों वाले ज्ञानी विद्वानों को (आजिघर्ति) = [आहारयति] अपने घर पर प्राप्त कराता है। इस प्रकार इसका यह अतिथियज्ञ चलता है और यह उन अतिथियों की सप्रेरणा से सदा सुन्दर जीवनवाला बना रहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शत्रुशोषक बलों से चलनेवाला यह सदा आनन्दमय स्वभाव वाला व यज्ञशील तथा मिलनसार होता है