पदार्थान्वयभाषाः - भगत मन्त्र के ही प्रकरण को ही आगे कहते हैं कि प्रभु की शरण में रहनेवाला वह है (यः) = जो (विश्वस्या:) = सम्पूर्ण (देववीतेः) = दिव्यगुणों की प्राप्ति का (ईशे) = ईश होता है, अर्थात् सब दिव्यगुणों को प्राप्त करने में समर्थ होता है । (उषसः व्युष्टौ) = उषः काल के उदित होने पर (विश्वायुः) = पूर्ण जीवनवाला बना हुआ यह 'त्रित' [मन्त्र का ऋषि] (ईशे) = उन दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए सामर्थ्यवान् होता है। वस्तुतः यह त्रित उष:काल में अवश्य प्रबुद्ध होकर, पवित्र भावना से प्रभु के स्वागत के लिए उद्यत होता है। ये प्रभु प्रातः आते हैं और जब हम इनका स्वागत करते हैं तो ये हमें द्युमत्तम रयि = अत्यन्त ज्योतिर्मय धनों को प्राप्त कराते हैं । (यस्मिन् अग्नौ) = जिस प्रगतिशील व्यक्ति के जीवन में (मना) = मननीय, ज्ञान को बढ़ानेवाली, बुद्धि की मननशक्ति को दी करनेवाली (हवींषि आ) [हुतानि] = हवियाँ आहुत होती हैं, अर्थात् जो सदा त्याग पूर्वक उपभोग करता है, दूसरे शब्दों में अमृत [यज्ञशेष] का सेवन करता है वह (अरिष्टरथः) = अहिंसित शरीर वाला होता हुआ (शूषैः) = शत्रुओं के शोषक बलों से स्कभ्नाति= सब अशुभ वासनाओं के आक्रमणों को रोक देता है । अर्थात् सात्त्विक अन्न के सेवन से तथा यज्ञशेष के रूप में भोजन करने से इसकी बुद्धि व मनोवृत्ति भी बड़ी सात्त्विक बनी रहती हैं और यह वासनाओं से आक्रान्त नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सात्त्विक यज्ञशिष्ट भोजन हमें सब दिव्यगुणों की प्राप्ति के योग्य बनाता है ।