शान्ति-सोमरक्षण-पथ्य-सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमें (पृथिवी) = पृथिवी (पुनः) = फिर (असुं ददातु) = प्राणशक्ति को दे ।( देवी द्यौ:) = देदीप्यमान द्युलोक भी (पुनः) = फिर प्राण को दे । (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष फिर प्राण को दे । पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक हमें प्राण को देनेवाले हों। अध्यात्म में पृथिवीलोक 'शरीर' है । अन्तरिक्षलोक 'हृदय' है। द्युलोक 'मस्तिष्क' है। बाहर की त्रिलोकी व अन्दर की त्रिलोकी की अनुकूलता होने पर मनुष्य स्वस्थ होता है। 'द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिः ' इस प्रार्थना का यही अभिप्राय है। इन की परस्पर अनुकूलता के होने पर शरीर दृढ़ होता है, हृदय चन्द्रमा की ज्योत्स्ना को लिये हुए होता है, मस्तिष्क दीप्त होता है । [२] (सोमः) = सोम - रसादि के क्रम से उत्पन्न हुआ हुआ वीर्य (नः) = हमारे लिये (पुनः) = फिर (तन्वम्) = शक्तियों के विस्तारवाले शरीर को (ददातु) = दे। सोम के रक्षण से ही नीरोगता व अन्य शक्तियों की प्राप्ति होती है । उन्नतिमात्र का मूल सोमरक्षण है। 'ब्रह्मचर्यं परोधर्म: 'इसीलिए ब्रह्मचर्य को परधर्म कहा है। [३] (पूषा) = वह पोषण करनेवाला प्रभु (पुनः) = फिर (पथ्याम्) = पथ्य भोजन की वृत्ति को दे, (या) = जो पथ्य भोजन की वृत्ति 'अनुमति' की यह भावना भी महत्त्वपूर्ण है कि मन तो कहता है कि भोजन बड़ा स्वादिष्ट है थोड़ा- सा और खा लो, पर मति = बुद्धि प्रतिवाद करती हुई कहती है कि यह दीर्घ जीवन के लिये ठीक नहीं तो अधिक नहीं खाना। इसी प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में मन की इच्छा पर दीर्घ जीवन के दृष्टिकोण से प्रतिबन्ध रखनेवाली मति ही 'अनुमति' है । यह हमारा निश्चय से कल्याण करनेवाली है । (स्वस्तिः) = वस्तुतः उत्तम अस्तित्व को देनेवाली है । पथ्य भोजन से रोग होते ही नहीं, अचानक आ गये रोग भी नष्ट हो जाते हैं । अपथ्य सब रोगों का मूल है। अपथ्य के होने पर अच्छे से अच्छे औषध भी रोगों को दूर नहीं कर पाते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'त्रिलोकी की अनुकूलता, सोम का रक्षण, पथ्य का सेवन' ये तीन बातें दीर्घायुष्य के लिये आवश्यक हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना - ५-६ व ७ संख्या के मन्त्रों में दीर्घ जीवन के क्रमशः निम्न उपाय निर्दिष्ट हुए हैं— [क] मन की दृढ़ता, [ख] क्रियाशील जीवन, [ग] सूर्य सम्पर्क, [घ] गोघृत का यथोचित सेवन, [ङ] ज्ञानेन्द्रियों का ठीक रखना, [च] प्राणशक्ति में कमी न आने देना, [छ] निर्धनता को दूर रखना, [ज] मन की इच्छाओं को बुद्धि से संयत करके दीर्घजीवन के अनुकूल सोचना व करना [अनुमति], [झ] बाह्य जगत् व अन्तर्जगत् में सामञ्जस्य [ञ] सोम [= वीर्य] रक्षण, [ट] पथ्य - भोजन । ये ११ बातें हमें अवश्य शतायु करेंगी।