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असु॑नीते॒ पुन॑र॒स्मासु॒ चक्षु॒: पुन॑: प्रा॒णमि॒ह नो॑ धेहि॒ भोग॑म् । ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑मु॒च्चर॑न्त॒मनु॑मते मृ॒ळया॑ नः स्व॒स्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asunīte punar asmāsu cakṣuḥ punaḥ prāṇam iha no dhehi bhogam | jyok paśyema sūryam uccarantam anumate mṛḻayā naḥ svasti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

असु॑ऽनीते । पुनः॑ । अ॒स्मासु॑ । चक्षुः॑ । पुन॒रिति॑ । प्रा॒णम् । इ॒ह । नः॒ । धे॒हि॒ । भोग॑म् । ज्योक् । प॒श्ये॒म॒ । सूर्य॑म् । उ॒त्ऽचर॑न्तम् । अनु॑ऽमते । मृ॒ळय॑ । नः॒ । स्व॒स्ति ॥ १०.५९.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:59» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (असुनीते) हे प्राणों को प्राप्त करानेवाले परमात्मन् ! (पुनः-इह अस्मासु चक्षुः-प्राणं भोगं नः-धेहि) तू इस जीवन में-इस पुनर्जन्म में हमारे निमित्त पुनः नेत्र, पुनः प्राण और भोग पदार्थ को धारण करा (सूर्यम्-उच्चरन्तं ज्योक् पश्येम) उदय होते हुए सूर्य को चिरकाल तक देखें (अनुमते नः स्वस्ति मृळय) हे आज्ञापक परमेश्वर ! हमारे लिए कल्याण जैसे हो, ऐसे सुखी कर ॥६॥
भावार्थभाषाः - पुनर्जन्म में प्राण नेत्र आदि अङ्ग पूर्वजन्म के समान परमात्मा देता है। वह हमारे जीवन को सुखी बनाने के लिए सब साधन भोगपदार्थ देता है, उसका हमें कृतज्ञ होना चाहिए तथा उपासना करनी चाहिए ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'चक्षु- प्राण-धन-सूर्य-दर्शन व अनुमति'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (असुनीते) = प्राणधारण के मार्ग ! तू (अस्मासु) = हमारे में (पुनः) = फिर (चक्षुः) = दृष्टिशक्ति को (धेहि) = धारण कर, (पुनः) = फिर (प्राणम्) = प्राणशक्ति को दे । (इह) = इस जीवन में (नः) = हमारे लिये (भोगम्) = शरीर के पालन के लिये आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के साधनभूत धन को धारण करिये। एवं असुनीति यह है कि [क] हम चक्षु आदि इन्द्रियों की शक्ति को क्षीण न होने दें। [ख] प्राणशक्ति को कायम रखें, [ग] उचित धन की मात्रावाले हों। निर्धनता हीन भोजन का कारण बनेगी और उससे चक्षु व प्राण दोनों में क्षीणता आयेगी । [२] हम (उच्चरन्तम्) = उदय होते हुए (सूर्यम्) = सूर्य को (ज्योक् पश्येम) = दीर्घकाल तक देखनेवाले हों। यह सूर्य दर्शन व सूर्य-सम्पर्क में रहना ही तो मुख्य रूप से हमारे दीर्घायुष्य का कारण होता है। [३] हे (अनुमते) = अनुकूलमति ! (मृडया) = तू सुखी कर । तेरी कृपा से (नः स्वस्ति) = हमारा कल्याण हो । 'हर वक्त मृत्यु का ध्यान आना व मृत्यु की चिन्ता करना' ही प्रतिकूलमति है। यह जीवन के ह्रास का महान् कारण होती है। अनुमति का स्वरूप तो यह है कि 'जीवेम शरदः शतम्' हम सौ वर्ष तक अवश्य जीयेंगे ही।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] इन्द्रियों को ठीक रखना, [ख] प्राणशक्ति में कमी न आने देना, [ग] निर्धनता का न होना, [घ] सूर्य सम्पर्क, [ङ] अनुकूल मति ये बातें दीर्घजीवन का कारण हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (असुनीते) हे प्राणप्रापक परमात्मन् ! (पुनः-इह-अस्मासु चक्षुः-प्राणं भोगं नः-धेहि) त्वमिह पुनर्जन्मनि-अस्मभ्यं खल्वस्मासु पुनर्नेत्रं भोगपदार्थं धारय (सूर्यम्-उच्चरन्तं ज्योक् पश्येम) उद्गच्छन्तं सूर्यं चिरं पश्येम (अनुमते नः स्वस्ति मृळय) आज्ञापक परमेश्वर ! “अनुमते-हे अनन्त परमेश्वर” [ऋ० १०।५९।६। भाष्यभूमिका, दयानन्दः] अस्मान् स्वस्ति सु-अस्तित्वं यथा स्यात् तथा सुखय ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divine Spirit of life and energy, bless us constantly with the faculty of vision, constant pranic energy too, and vest in here in the body the capacity and faculties to live and enjoy the sweets of life. O motherly spirit of love and acceptance, may we see the rising sun for a long time. Be pleased and kind and bless us with happiness and well being all through in life.