'चक्षु- प्राण-धन-सूर्य-दर्शन व अनुमति'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (असुनीते) = प्राणधारण के मार्ग ! तू (अस्मासु) = हमारे में (पुनः) = फिर (चक्षुः) = दृष्टिशक्ति को (धेहि) = धारण कर, (पुनः) = फिर (प्राणम्) = प्राणशक्ति को दे । (इह) = इस जीवन में (नः) = हमारे लिये (भोगम्) = शरीर के पालन के लिये आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के साधनभूत धन को धारण करिये। एवं असुनीति यह है कि [क] हम चक्षु आदि इन्द्रियों की शक्ति को क्षीण न होने दें। [ख] प्राणशक्ति को कायम रखें, [ग] उचित धन की मात्रावाले हों। निर्धनता हीन भोजन का कारण बनेगी और उससे चक्षु व प्राण दोनों में क्षीणता आयेगी । [२] हम (उच्चरन्तम्) = उदय होते हुए (सूर्यम्) = सूर्य को (ज्योक् पश्येम) = दीर्घकाल तक देखनेवाले हों। यह सूर्य दर्शन व सूर्य-सम्पर्क में रहना ही तो मुख्य रूप से हमारे दीर्घायुष्य का कारण होता है। [३] हे (अनुमते) = अनुकूलमति ! (मृडया) = तू सुखी कर । तेरी कृपा से (नः स्वस्ति) = हमारा कल्याण हो । 'हर वक्त मृत्यु का ध्यान आना व मृत्यु की चिन्ता करना' ही प्रतिकूलमति है। यह जीवन के ह्रास का महान् कारण होती है। अनुमति का स्वरूप तो यह है कि 'जीवेम शरदः शतम्' हम सौ वर्ष तक अवश्य जीयेंगे ही।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] इन्द्रियों को ठीक रखना, [ख] प्राणशक्ति में कमी न आने देना, [ग] निर्धनता का न होना, [घ] सूर्य सम्पर्क, [ङ] अनुकूल मति ये बातें दीर्घजीवन का कारण हैं।