पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = शान्त प्रभो! आप (नः) = हमें मृत्यवे मृत्यु के लिये (मा उ सु परादाः) = मत ही दे डालिये। आपकी कृपा से हम मृत्यु के शिकार न हों, दीर्घजीवनवाले बनें। इस दीर्घ जीवन के लिये (नु) = निश्चय से (उच्चरन्तम्) = ऊपर आकाश में गति करते हुए (सूर्यम्) = सूर्य को (पश्येम)= हम देखनेवाले बनें। यह ‘सूर्याभिमुख होकर ध्यान में बैठना और सूर्य किरणों को छाती पर लेना' हमारे स्वास्थ्य का कारण बनेगा। 'हिरण्यपाणि' सूर्य हमारे शरीरों में स्वर्ण को संचरित कर रहा होगा। [२] (द्युभिः) = दिनों से (हितः) = स्थापित किया हुआ (जरिमा) = बुढ़ापा (नः) = हमारे लिये (सु अस्तु) = उत्तम ही हो, यह जीर्णता का कारण न बने। हम वृद्ध [= बढ़े हुए] बनें, न कि जीर्ण। एक-एक दिन के बीतने के साथ आयुष्य तो काल के दृष्टिकोण से कम और कम होता ही है, परन्तु हमारी शक्तियाँ जीर्ण न हो जाएँ। (निर्ऋतिः) = दुर्गति (सु) = अच्छी प्रकार (परातरम्) = दूर और खूब ही दूर (जिहीताम्) = चली जाए। हमारी स्थिति अच्छी ही हो, यह होगी तभी जब कि हम जीर्ण न होंगे। सूर्य के सम्पर्क में स्वस्थ रहते हुए हम जीर्ण शक्ति न हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम की कृपा से हम मृत्यु से दूर हों । सूर्य सम्पर्क हमें नीरोगता दे।