पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुध) = नाना प्रकार से धारण करनेवाले प्रभो ! (नु) = अब हम (सामन्) = साम के होने पर, अर्थात् साम मन्त्रों से प्रभु के गुणों का गायन करने पर राये धन के लिये (करामहे) = हम पूर्ण पुरुषार्थ करते हैं। प्रभु के स्मरण के साथ धन प्राप्ति के लिये प्रयत्न के होने पर उन प्रयत्नों में पवित्रता बनी रहती है और हमें उन धनों के विजय का गर्व नहीं होता, उन धनों का विजेता हम प्रभु को ही मानते हैं । [२] हम (निधिमत् अन्नं करामहे) = निधिवाले, निधानवाले शरीर में ही स्थिर तत्त्वों को जन्म देनेवाले, रस रुधिर आदि उत्तम धातुओं को उत्पन्न करनेवाले अन्न को हम करते हैं । 'निधिमत् अन्न' स्थिर सात्त्विक अन्न है । [३] इस स्थिर सात्त्विक अन्न के सेवन से हम (सुश्रवांसि) = उत्तम ज्ञानों व यशों को करते हैं । सात्त्विक अन्न हमारी बुद्धि को सात्त्विक करके हमारे जीवन को यशस्वी बनाता है । [४] (नः जरिता) = हमारा स्तवन करनेवाला (ता विश्वानि) = उन सब चीजों को (ममत्तु) = आनन्दपूर्वक आस्वादित करे। वह 'धन, अन्न, ज्ञान व यश' से जीवन में आनन्द का अनुभव करे। और (निर्ऋतिः) = दुर्गति (परातरम्) = बहुत दूर (सुजिहीताम्) = पूर्णतया चली जाये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्मरण करते हुए 'धन, अन्न, ज्ञान व यश' को प्राप्त करके दुर्गति से दूर हों और सुगति को प्राप्त करें।