यत्ते॒ पर्व॑तान्बृह॒तो मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yat te parvatān bṛhato mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||
पद पाठ
यत् । ते॒ । पर्व॑तान् । बृ॒ह॒तः । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.९
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:9
| अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:21» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:9
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसिक रोगी ! तेरा (यत्-मनः) जो मन (बृहतः पर्वतान् दूरकं जगाम) बड़े-बड़े पर्वतों के प्रति कल्पना से दूर चला गया है (ते तत्……) पूर्ववत् ॥९॥
भावार्थभाषाः - मानसरोगग्रस्त मनुष्य जब भ्रान्त-सी अवस्था में अपने को पहाड़ों पर भटकता हुआ अनुभव करे और वैसी ही बातें करे, तो उसे भी सान्त्वनापूर्ण आश्वासनों से शान्त करे ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ऊँचे पर्वतों की ओर
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) = तेरा मन (बृहतः पर्वतान्) = इन उच्च श्रृंगवाले बड़े-बड़े पर्वतों की ओर (दूरकं जगाम) = दूर-दूर जाता है (ते) = तेरे (तत्) = उस मन को (आवर्तयामसि) = लौटाते हैं जिससे (इह क्षयाय) = वह यहाँ अपने क्रियमाण कर्म में ही निवास करे और (जीवसे) = उत्तम जीवन के लिये हो। [२] हमारा मन पहाड़ों में भटकता है, पहाड़ों की ऊँची चोटियों की ओर जाता है। इस मन को निरुद्ध करके अपने कर्त्तव्य कर्मों में ही स्थिर करना चाहिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पर्वतों की ऊँची चोटियों में भटकनेवाले इस मन को हम निरुद्ध करें।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त जन ! तव (यत्-मनः) यन्मनः (बृहतः पर्वतान्) महतः पर्वतान् प्रति कल्पनया दूरकं जगाम दूरं गतम् (ते तत्……) पूर्ववत् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Your mind that wanders far over mighty mountains and vast floating clouds, we bring back to normalcy, here to be at peace for your good life.
