पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) = तेरा मन (सूर्यम्) = सूर्य की ओर, और (यत्) = जो (उषसम्) = उषा की ओर (दूरकं जगाम) = दूर-दूर जाता है कभी सूर्य का ध्यान करता है और कभी उषा का (तत्) = उस (ते) = तेरे मन को (इह) = यहाँ (क्षयाय आवर्तयामसि) = जीवन के प्रस्तुत कार्यों में निवास के लिये लौटाते हैं (जीवसे) = जिससे यह मन दीर्घ व उत्तम जीवन का कारण बने । [२] सूर्य व उषाकाल के सोचने का यहां भाव यह है कि मन इस रूप में सोचा करता है कि- 'प्रातः काल होगा, सूर्य निकलेगा और मैं वहाँ जाऊँगा, उससे मिलूँगा, यह आनन्द लूँगा और वह आनन्द प्राप्त करूँगा।' मन को इस प्रकार सोचते रहने से रोककर कर्त्तव्य कर्म में लगाना ही ठीक है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-मन को 'सवेरा होगा, सूर्य निकलेगा, यह खायेंगे, वह पीयेंगे' इस प्रकार सोचते रहने से रोककर प्रस्तुत कर्म में लगाना ही ठीक है ।