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यत्ते॑ समु॒द्रम॑र्ण॒वं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te samudram arṇavam mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ते॒ । स॒मु॒द्रम् । अ॒र्ण॒वम् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसिक रोग से ग्रस्त मनुष्य ! तेरा (यत्-मनः-अर्णवं समुद्रं दूरकं जगाम) जो मन जलवाले समुद्र को दूर चला गया है (ते तत्……) पूर्ववत् ॥५॥
भावार्थभाषाः - मानसिक रोगग्रस्त का मन भ्रान्त हुआ-हुआ जल से आप्लावित समुद्र में अपने को तैरता हुआ या डूबता हुआ बतलाये, तो उसे इस प्रसङ्ग के निवारक आश्वासन देकर शान्त करें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जलोंवाले समुद्र की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) = तेरा मन (अर्णवं समुद्रम्) = जलोंवाले समुद्र की ओर (दूरकं जगाम) = दूर-दूर जाता है (ते) = तेरे (तत्) = उस मन को (आवर्तयामसि) = लौटाते हैं जिससे (इह क्षयाय) = यह यहाँ ही निवास व गति के लिये हो और (जीवसे) = दीर्घ व उत्तम जीवन के लिये हो । [२] मन अपने अन्दर निहित संस्कारों के कारण कभी-कभी समुद्रों की सैर करने लगता है, समुद्रों में उठती हुई लहरों का ध्यान करता है, प्रस्तुत कार्य में स्थिर नहीं होता। वे कार्य ठीक से नहीं होते और जीवन में सफलता नहीं मिलती। सफल जीवन के लिये मन को न भटकने देना आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दूर-दूर समुद्रों में भटकते हुए मन को हम अपने अन्दर ही रोकने का प्रयत्न करें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त जन ! तव (यत्-मनः अर्णवं समुद्रं दूरकं जगाम) यन्मनो जलवन्तं समुद्रं दूरं गतम् (ते तत्……) पूर्ववत् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Your mind that wanders far over the sea and the waters of space, we bring back for you, here to be at peace for you for the good life.