यत्ते॒ चत॑स्रः प्र॒दिशो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yat te catasraḥ pradiśo mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||
पद पाठ
यत् । ते॒ । चत॑स्रः । प्र॒ऽदिशः॑ । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.४
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:4
| अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:4
| मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:4
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त मनुष्य ! तेरा (यत्-मनः) जो मन (चतस्रः-प्रदिशः-दूरकं जगाम) चारों प्रधान दिशाओं के प्रति दूर चला गया है। (ते तत्……) पूर्ववत् ॥४॥
भावार्थभाषाः - मानसिक रोग के रोगी का मन जब कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी उत्तर, कभी दक्षिण दिशा सम्बन्धी बातें क्षण-क्षण में बदल कर करे, तो उस ऐसे भ्रान्त मनवाले को उचित आश्वासनों द्वारा स्वस्थ एवं शान्त बनाएँ ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
जीवसे
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते) = तेरा (मनः) = मन (चतस्रः प्रदिशः) = चारों विशाल दिशाओं में (दूरकं जगाम) = दूर-दूर जाता है (ते) = तेरे (तत्) = उस मन को (आवर्तयामसि) = लौटाते हैं जिससे (इह क्षयाय) = यह यहाँ ही निवास व गति के लिये हो और (जीवसे) = दीर्घ व उत्तम जीवन को हम सिद्ध कर सकें। [२] मन इधर-उधर इन अनन्त विस्तृत दिशाओं में भटकता है, इस भटकने से उसकी शक्ति विखर जाती है। परिणामतः कोई भी कार्य सुन्दरता से नहीं हो पाता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - चारों दिशाओं में भटकते हुए मन को रोकना ही ठीक है ।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त जन ! तव (यत्-मनः) यदन्तःकरणम् (चतस्रः प्रदिशः-दूरकं जगाम) चतस्रः प्रधाना दिशः प्रति दूरं गतम् (ते तत्……) पूर्ववत् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Your mind which wanders far over all the four directions of space, that we bring back for you, here to be at peace for the good life.
