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यत्ते॒ दिवं॒ यत्पृ॑थि॒वीं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te divaṁ yat pṛthivīm mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ते॒ । दिव॑म् । यत् । पृ॒थि॒वीम् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-ते मनः) हे मानसिक रोग के रोगी ! तेरा मन (दिवं यत् पृथिवीं मनः दूरकं जगाम) द्युलोक या पृथिवीलोक के प्रति जागरण काल में दूर चला गया है, उस (ते तत्…) तेरे मन को हम लौटाते हैं यथास्थान प्राप्ति के लिए और दीर्घजीवन धारण के लिए ॥२॥
भावार्थभाषाः - मानस रोगी के रोगी का मन जागते हुए भ्रान्त होकर के ग्रह-तारों की  अन्यथा बातें करता हो, तो आश्वासन देकर स्वस्थ बनाना चाहिए ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्युलोक व पृथिवीलोक की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) = तेरा मन (दिवम्) = द्युलोक की ओर (दूरकं जगाम्) = दूर जानेवाला होता है और (यत्) = जो (पृथिवीम्) = पृथिवी की ओर दूर-दूर जाता है, (ते) = तेरे उस मन को (आवर्तयामसि) = वापिस लौटाते हैं इह क्षयाय = यहां ही रहकर गति के लिये और (जीवसे) = दीर्घ व सुन्दर जीवन के लिये । [२] मन भी द्युलोक में भटकता है तो कभी पृथिवीलोक में । कभी इस सिरे पर और कभी उस सिरे पर । यह प्रत्येक कार्य को सुन्दरता से कर पाता है और जीवन की प्रशस्तता का कारण बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम द्युलोक व पृथ्वीलोक में भटकने से मन को रोकते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-ते मनः) हे मानसरोगस्य रोगिन् ! यत् तव मनः (दिवं यत् पृथिवीं मनः-दूरकं जगाम) द्युलोकं यत् खलु वा पृथिवीं जागरणे कालेऽपि दूरं गतम् (ते तत्…) तव तन्मनः प्रत्यावर्तयामो यथास्थानप्राप्तये जीवनधारणकरणाय ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Your mind that wanders far and roams over earth and heaven, we bring it back to normalcy, here to be at peace for the good life for you.