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यत्ते॑ भू॒तं च॒ भव्यं॑ च॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te bhūtaṁ ca bhavyaṁ ca mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ते॒ । भू॒तम् च॒ । भव्य॑म् । च॒ । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.१२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:12 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:21» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:12


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) मानसरोगग्रस्त जन ! तेरा (यत्-मनः) जो मन (भूतं च भव्यं च दूरकं जगाम) बीती बातों या विषयों में और भविष्य की बातों के प्रति दूर चला गया है-दौड़ गया है (ते तत्……) पूर्ववत् ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मानसिक रोग में ग्रस्त मनवाले व्यक्ति का मन कभी बहुत पुरानी बातों को सोचता रहता है, कभी भविष्य की अनावश्यक कल्पनाएँ करता रहता है, उसे भी विविध उपचारों और आश्वासनों से शान्त तथा स्वस्थ बनाना चाहिए ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सदा 'था' व 'गा' में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) - तेरा मन (भूतं च) = भूतकाल में (जगाम) = जाता है, हर समय भूतकाल की ही बातें सोचा करता है, (च) = और (भव्यं दूरकं जगाम) = भविष्यत्काल में बड़ी दूर चला जाता है, भविष्यत् की ही बातें सोचने लगता है, (ते तत्) = तेरे उस मन को (इह क्षयाय) = यहाँ ही वर्तमानकाल में निवास व गति के लिये आवर्तयामसि लौटाते हैं। जिससे (जीवसे) = हमारा जीवन दीर्घ व उत्तम हो। [२] कई लोग निराशावाद की वृत्ति के होते हैं, प्रायः ये वृद्ध लोग भूतकाल की ही बात किया करते हैं। इन्हें भूत बड़ा उज्ज्वल दिखता है, वर्तमान बड़ा अवनत प्रतीत होता है। ये सदा 'था' की ही बात करते हैं । इनके विपरीत जीवन को प्रारम्भ करनेवाले युवक लोग 'कोठी बनायेंगे, कार खरीदेंगे, सन्तान को प्राशासक बनायेंगे' इत्यादि सुख-स्वप्न लेते हुए सदा उज्ज्वल भविष्य की बातें करते रहते हैं । चाहिए यह कि 'भूत व भव्य' से मन को हटाकर वर्तमान में ही केन्द्रित करें। सफल जीवन का यही मार्ग है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम भूत व भविष्य में न भटकते रहकर वर्तमान में रहनेवाले बनें । इस सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से है कि हम मन में सदा मृत्यु के ही विचार न उठते रहने दें, [१] इस भटकते हुए मन को रोकें [२-११] और 'था' व 'गा' की भाषा में न बोलते हुए सदा 'है' की भाषा ही बोलें। यही उत्तम जीवन का मार्ग है, [१२] निरोध से ही जीवन नवीन व स्तुत्य बनेगा-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त जन ! तव (यत्-मनः) यन्मनः (भूतं च भव्यं च दूरकं जगाम) भूतं गतविषयं भविष्यविषयं प्रति च दूरं गतम् (ते तत्……) पूर्ववत् ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Your mind that wanders far over the past and the future that is unpredictable, we bring back to normalcy, here to be at peace for your happy life.