पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) - तेरा मन (भूतं च) = भूतकाल में (जगाम) = जाता है, हर समय भूतकाल की ही बातें सोचा करता है, (च) = और (भव्यं दूरकं जगाम) = भविष्यत्काल में बड़ी दूर चला जाता है, भविष्यत् की ही बातें सोचने लगता है, (ते तत्) = तेरे उस मन को (इह क्षयाय) = यहाँ ही वर्तमानकाल में निवास व गति के लिये आवर्तयामसि लौटाते हैं। जिससे (जीवसे) = हमारा जीवन दीर्घ व उत्तम हो। [२] कई लोग निराशावाद की वृत्ति के होते हैं, प्रायः ये वृद्ध लोग भूतकाल की ही बात किया करते हैं। इन्हें भूत बड़ा उज्ज्वल दिखता है, वर्तमान बड़ा अवनत प्रतीत होता है। ये सदा 'था' की ही बात करते हैं । इनके विपरीत जीवन को प्रारम्भ करनेवाले युवक लोग 'कोठी बनायेंगे, कार खरीदेंगे, सन्तान को प्राशासक बनायेंगे' इत्यादि सुख-स्वप्न लेते हुए सदा उज्ज्वल भविष्य की बातें करते रहते हैं । चाहिए यह कि 'भूत व भव्य' से मन को हटाकर वर्तमान में ही केन्द्रित करें। सफल जीवन का यही मार्ग है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम भूत व भविष्य में न भटकते रहकर वर्तमान में रहनेवाले बनें । इस सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से है कि हम मन में सदा मृत्यु के ही विचार न उठते रहने दें, [१] इस भटकते हुए मन को रोकें [२-११] और 'था' व 'गा' की भाषा में न बोलते हुए सदा 'है' की भाषा ही बोलें। यही उत्तम जीवन का मार्ग है, [१२] निरोध से ही जीवन नवीन व स्तुत्य बनेगा-