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यत्ते॒ परा॑: परा॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te parāḥ parāvato mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ते॒ । पराः॑ । प॒रा॒ऽवतः॑ । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:21» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोग में ग्रस्त जन ! तेरा (यत्-मनः) जो मन (पराः परावतः) दूर दिशाओं तथा दूर देशों के प्रति (दूरकं जगाम) दूर चला गया है (ते तत्……) पूर्ववत् ॥११॥
भावार्थभाषाः - मानसिकरोगग्रस्त मनुष्य का मन भ्रान्त हुआ दूर दिशाओं और दूर देशों में भटकता प्रतीत होता है, उसे भी यथोचित उपचारों एवं आश्वासनों से ठीक बनाना चाहिए ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दूर से दूर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते) = तेरा (मनः) = मन (पराः परावतः) = दूर से दूर प्रदेशों में भटकता हुआ (दूरकं जगाम) = अनन्त दूर चला जाता है, (ते) = तेरे (तत्) = उस मन को (इह) = यहां ही (क्षयाय) = निवास व गति के लिये आवर्तयामसि लौटाते हैं जिससे (जीवसे) = यह मन दीर्घ व उत्तम जीवन का साधन बने । [२] मन (स्वभावतः) = दूर-दूर भटकता है। इसका निरोध करके ही हम किसी भी कार्य में सफल हो पाते हैं। जीवन भी शक्तियों के केन्द्रित हो जाने से उत्तम व दीर्घ होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम इस दूर-दूर जानेवाले मन का निरोध करें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे मानसरोगग्रस्त जन ! तव (यत्-मनः) यत् खलु मनः (पराः परावतः) परदिशो यद्वा परदेशान् (दूरकं जगाम) दूरं गतम् (ते तत्……) पूर्ववत् ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Your mind that wanders far and farther over regions unknown, we bring back to normalcy, here to be at peace for your good life.