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यत्ते॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te yamaṁ vaivasvatam mano jagāma dūrakam | tat ta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ते॒ । य॒मम् । वै॒व॒स्व॒तम् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:58» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में भ्रान्त मन का पुनः यथास्थिति में लौटाना, भ्रान्ति से मन विविधस्थानों में भटकता हुआ अव्यवस्थितरूप में जो दुःखों को पाता है, उसे विविध उपचार एवं आश्वासनों से स्वस्थ करना बताया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत् ते मनः) हे मानसिक-रोगयुक्त जन ! जो तेरा मन (वैवस्वतं यमं दूरकं जगाम) विवस्वान्-सूर्य से सम्बन्ध रखनेवाले काल के प्रति कल्पना से दूर चला गया है, न जाने क्या होगा, इस चिन्ता में पड़ गया है (ते तत्-आ वर्तयामसि) उस तेरे मन को हम वापस ले आते हैं (इह क्षयाय जीवसे) इसी शरीर में रहने और दीर्घजीवन के लिए ॥१॥
भावार्थभाषाः - मानसिक रोग का रोगी कल्पना से अन्यथा विचार करता हो कि न जाने क्या होगा ! मरूँगा ! तो कुशल चिकित्सक आश्वासन-चिकित्सा-पद्धति से उसे आश्वासन दे कि तू नहीं मरेगा, तेरे मन को इसी देह में रहने के लिए-दीर्घजीवन के लिए हम स्थिर करते हैं, तू चिन्ता न कर ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'यम वैवस्वत' की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (ते मनः) = तेरा मन (वैवस्वतम्) = विवस्वान् सम्बन्धी (यमम्) = मृत्यु के देव की ओर (दूरकं जगाम) = दूर-दूर जाता है (ते) = तेरे (तत्) = उस मन को (आवर्तयामसि) = वापिस लौटाते हैं । (इह क्षयाय) = यहाँ ही [क्षि निवासगत्योः] निवास व गति के लिये । इसलिए मन को लौटाते हैं कि वह यहीं रहे, जिस कार्य को कर रहे हैं उससे दूर न हो जिससे (जीवसे) = हमारा जीवन उत्तम व दीर्घ हो, दीर्घ जीवन के लिये मन को न भटकने देना आवश्यक है। भटकता हुआ मन शक्तियों की विकीर्णता का कारण बनता है और इस प्रकार जीवन का ह्रास हो जाता है। [२] यहाँ यम को, मृत्यु की देवता को वैवस्वत कहा है। विवस्वान् 'सूर्य' है, सूर्य की गति से दिन- रात बनते हैं और एक-एक करके आयुष्य के दिन घटते जाते हैं। इसी कारण यम को यहाँ वैवस्वत कहा गया है। कभी-कभी हमारा मन मृत्यु की ओर चला जाता है, कुछ मृत्यु का भय लगने लगता है । हमारी सारी क्रियाएँ उदासी के कारण समाप्त हो जाती हैं। हम मृत्यु का ही राग अलापने लगते हैं, इससे जीवन का ह्रास हो जाता है। मृत्यु को भूलना नहीं चाहिये, परन्तु मृत्यु का ही राग अलापते रहना भी ठीक नहीं। हम अपने मन को इस 'यम' से वापिस लाते हैं। मृत्यु को न भूलना जहाँ हमें धर्म-प्रवण करता है वहाँ हर समय मौत का ही ध्यान करते रहना हमें निराश व अकर्मण्य बना देता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मन में हर वक्त मौत का ही चिन्तन करते रहना ठीक नहीं।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते भ्रान्तस्य मनसः आवर्तनमुच्यते। यद् भ्रान्त्या मनो विविधेषु स्थानेषु निरन्तरं यत्र तत्राव्यवस्थितं सद् दुःखमवाप्नोति। विविधैरुपचारैराश्वासनैश्च तस्य स्वस्थं करणं कथ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-ते मनः) हे मानसिक-रोगयुक्त जन ! तव यत् खलु मनोऽन्तःकरणम् (वैवस्वतं यमं दूरकं जगाम) विवस्वान् सूर्यः, तत्सम्बन्धिनं यमयितारं स्वाधीनीकर्त्तारं कालं प्रति कल्पनया न जाने किं भविष्यतीति चिन्तयन् दूरं गतम् (ते तत्-आवर्तयामसि) तव तन्मनो वयं प्रत्यानयामः-स्थिरीकुर्मः (इह क्षयाय जीवसे) अत्रैव शरीरे स्थितिं प्रापणाय दीर्घजीवनाय ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The theme of this hymn is ‘Return of the mind’ from wandering and depression to normalcy for a healthy life.$O man, that mind of yours that wanders far to the sun and broods over time and death, that we restore to normalcy, here to stay at peace for the good life.