पदार्थान्वयभाषाः - [१] (युजा) = उस प्रभु रूप सदा साथ रहनेवाले मित्र के साथ (कर्माणि जनयन्) = कर्मों को पैदा करता हुआ यह होता है। कर्म करता है और उन कर्मों को प्रभु की शक्ति से होता हुआ अनुभव करता है, इसीलिए उन कर्मों का उसे अभिमान नहीं होता । कर्मों के करते रहने से ही यह ('विश्वौजाः') = यह व्याप्त बलवाला बनता है, सम्पूर्ण जीवन में शक्तिशाली बना रहता है, जीर्ण नहीं होता। शक्तिशाली बने रहने से (अशस्ति-हा) = सब अप्रशस्त बातों को यह समाप्त करता है, इसके शरीर में रोग नहीं होते, मन में राग-द्वेष नहीं होते तथा बुद्धि में कुण्ठता नहीं रहती । (विश्वमनाः) = यह व्यापक व उदार मनवाला बनता है। इसके मन में उदारता के कारण किसी प्रकार की मलिनता नहीं रहती । (तुराषाट्) = यह शीघ्रता से शत्रुओं का पराभव करनेवाला होता है । संकुचित हृदय में ही वासनाएँ पनपा करती हैं। विशाल हृदय में वासनाएँ नहीं रह पाती, वे विनष्ट हो जाती हैं । [२] इस प्रकार अपने जीवन को बनाने के लिये यह (सोमस्य) = शरीर में उत्पन्न सोम [= वीर्य] शक्ति का पान करके (दिवः) = ज्ञानों को (आवृधानः) = सर्वथा बढ़ाता हुआ यह (शूरः) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाला बनता है और (युधा) = हृदय के रणक्षेत्र में चलनेवाले अध्यात्म युद्ध के द्वारा (दस्यून्) = ध्वंसक वृत्तियों को, इन्द्रियों की शक्ति को नष्ट करनेवाले काम को, मन को नष्ट करनेवाले क्रोध को, बुद्धि को नष्ट करनेवाले लोभ को (निरधमत्) = सन्तप्त करके दूर कर देता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - कर्म से शक्ति बढ़ती है, बुराइयाँ नष्ट होती हैं। हम सोम को शरीर में सुरक्षित करके ज्ञान को बढ़ाते हैं और शूर बनकर 'काम-क्रोध-लोभ' को पराभूत करते हैं । 'पराङ्मुखी वृत्तिवालों से प्रभु दूर रहते हैं' इन शब्दों से सूक्त का प्रारम्भ होता है, [१] और सोमरक्षण के द्वारा ज्ञान को बढ़ाकर काम-क्रोध-लोभ से ऊपर उठने के साथ सूक्त का अन्त है, [२] काम-क्रोध व लोभ के नाश से 'शरीर, हृदय व मस्तिष्क' की ज्योतियों का उदय होता है-