काल-चक्र [जन्म से मृत्यु तक]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विधुम्) = चन्द्रमा के समान अपने सौन्दर्य से औरों के हृदयों को विद्ध करनेवाले बालक उत्पन्न होता है, उसका सुन्दर मुख सभी को अपनी ओर आकृष्ट करता है, सो बालक विधु है । [२] कुछ बड़ा होकर (दद्राणम्) = विविध गतियों को यह निरन्तर करनेवाला होता है, इसके लिये शान्त बैठ सकने का सम्भव नहीं होता। बालक शब्द का अर्थ ही 'बल संचलने', संचलनशील है । [३] (बहूनाम्) = बहुतों के समने [ सम् अननात्, अन् प्राणने ] यह सम्यक् प्राणित करने में होता है, इसको देखकर माता-पिता आदि जी से उठते हैं। [४] धीमे-धीमे बढ़ता हुआ यह युवा बनता है। इस युवावस्था में यह 'यु मिश्रणामिश्रणयोः 'खूब जोड़-तोड़ में लगा रहता है। कुछ अच्छी वृत्ति होने पर बुराइयों से अपना अमिश्रण व अच्छाइयों से अपना मिश्रण करता है। पर यह चहल- पहल का जीवन बहुत देर तक नहीं रहता । (युवानं सन्तम्) = नौजवान होते हुए इसको (पलितः) = बुढ़ापे के कारण होनेवाली बालों की सफेदी जगार निगल लेती है। यह वृद्ध हो जाता है। यौवन की चहल-पहल व उमंगे समाप्त हो जाती हैं। [५] हे जीव ! तू (देवस्य) = उस क्रीड़ा करनेवाले, संसार रूप क्रीड़ा के [खेत के] अधिष्ठाता उस प्रभु के (काव्यम्) = इस अद्भुत कर्म को, कविता [wisdom, प्रज्ञा] पूर्ण कर्म को पश्य देख कि (महित्वा) = उसकी महिमा से (स) = वह व्यक्ति जो (ह्यः) = अभी कल ही (समान) = सम्यक् प्राणधारण कर रहा था, बिलकुल ठीक-ठाक था, वह (अद्या ममार) = आज मृत्यु का ग्रास हो गया है, वस्तुतः यह मृत्यु की घटना रहस्यमय होने से 'काव्य' ही है । यह मृत्यु रूप कर्म प्रज्ञा-पूर्ण भी है, क्योंकि इसके अभाव में यह संसार रहने योग्य न रहता, चलने-फिरने के लिये भी स्थान न होता। एक विद्वान् का यह वाक्य ठीक ही है कि 'Hed there been no death, manhwind world gave been foreed to intewt it ' = मृत्यु न होती, तो इसका भी आविष्कार ही करना पड़ता। [६] इस प्रकार कालचक्र में एक दिन हम शरीरधारण करके जीवनयात्रा को प्रारम्भ करते हैं और उसमें आगे बढ़ते हुए एक दिन अन्तिम स्थान पर पहुँच जाते हैं। यह सारी ही चीज विचारने पर अद्भुत-सी लगती है। =
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के कालचक्र में हम एक दिन आते हैं और आगे और आगे चलते हुए एक दिन चले जाते हैं ।