पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (उषः) = उषे (यत्) = जो तू (औच्छ:) = अन्धकार को दूर करती है सो (विभानां प्रथमा) = ज्योतियों में सर्वप्रथम होती है। तू उस ज्योतिवाली है (येन) = जिससे (पुष्टस्य) = प्रत्येक पोषणयुक्त के (पुष्टम्) = पोषण को (अजनयः) = उत्पन्न करती है उषा की ज्योति वायुमण्डल में ओजोन गैस की उत्पत्ति का कारण होती है, उस गैस की उत्पत्ति से यह सबका पोषण करती है। उषाकाल में भ्रमण का इसीलिए महत्त्व है । [२] (परस्याः) = उत्कृष्ट होती हुई भी (ते) = तेरा (यत्) = जो (अवरम्) = यहाँ नीचे [अस्मदभिमुखम् ] हमारे साथ (जामित्वम्) = सम्बन्ध है वह (महत्) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । (महत्या) = महनीय-आदरणीय तेरा (असुरत्वम्) = [ असून् राति, तस्य भावः] प्राणशक्ति को देने का गुण (एकम्) = अद्वितीय ही है। इस उषा के साथ सम्बन्ध को स्थापित करनेवाले व्यक्ति देव बन जाते हैं 'उषर्बुधो हि देवा:' । देव ही क्या, देव बनकर ब्रह्म को प्राप्त करते हुए ये ब्रह्म जैसे बन जाते हैं, ब्रह्म के साथ इनका सम्बन्ध होता है, इसलिए ही इस उषा के समय को 'ब्राह्म मुहूर्त' कहने की परिपाटी है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषा का प्राणशक्तिदायकता का गुण अनुपम हैं ।