पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभु हैं वे (ज्योतिषि अन्तः) = ज्योतिर्मय आदित्य आदि देवों में (ज्योतिः) = प्रकाश को (अदधात्) = स्थापित करते हैं । सूर्यादि देव अपनी ज्योति से दीप्त नहीं हो रहे, इनमें प्रभु ही ज्योति को स्थापित करनेवाले हैं । 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' । प्रभु दीप्ति को पाकर ही ये देव देवत्व को प्राप्त होते हैं 'तेन देवाः देवतामग्न आयन्' । बुद्धिमानों को बुद्धि रूप ज्योति भी प्रभु ही प्राप्त कराते हैं । [२] प्रभु वे हैं (यः) = जो (मधूनि) = जलों को (मधुना) = मधुर रस से (समसृजत्) = संसृष्ट करते हैं। जलों में रस प्रभु ही हैं। मानव स्वभाव को भी प्रभु कृपा से ही माधुर्य प्राप्त होता है। वे प्रभु ही हमारे ज्ञान को दीप्त करते हैं और हमारी वाणी को स्वादवाला, रसीला करते हैं । 'केतपू: केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु' । [३] (अध) = अब इसी उद्देश्य से (ब्रह्मकृतः) = ज्ञान का सम्पादन करनेवाले बृहदुक्थात् वृद्धि के कारणभूत स्तोत्रोंवाले व खूब स्तवन करनेवाले व्यक्ति से (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (प्रियम्) = प्रीति को देनेवाला (शूषम्) = बल वृद्धि का कारणभूत (मन्म) = स्तोत्र (अवाचि) = उच्चारित होता है। ज्ञानी स्तोता [ब्रह्मकृत् बृहदुक्थ] खूब ही प्रभु का स्तवन करता है इस स्तवन में वह प्रीति का अनुभव करता है और अपने में शक्ति के संचार को होता हुआ पाता है । प्रभु-भक्त का जीवन अन्दर ज्योतिर्मय होता है और बाहिर शान्त जल के प्रवाह की तरह रसीली वाणीवाला होता है। 'मस्तिष्क में ज्ञान की ज्योति तथा वाणी में रसमय जल की तरह शान्त शब्द ' प्रभु-भक्त के जीवन को आदर्श बना देते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु सर्वत्र ज्योति व माधुर्य को धारण करनेवाले हैं। हम उनका स्तवन करें, इससे आनन्द व शक्ति मिलेगी। सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि प्रभु के उपासन से दिव्यता का वर्धन होता है। [१] साधनों का ठीक प्रयोग न होने पर कष्ट भी आते ही हैं, [२] उस प्रभु की महिमा अनन्त है, [३] उसकी शक्ति अहिंसित है, [४] सब वसुओं के वे निधान हैं, [५] ज्योति व माधुर्य के धारण करनेवाले हैं, [६] वे प्रभु ही द्युलोक व पृथिवीलोक का धारण करते हैं-