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त्वं विश्वा॑ दधिषे॒ केव॑लानि॒ यान्या॒विर्या च॒ गुहा॒ वसू॑नि । काम॒मिन्मे॑ मघव॒न्मा वि ता॑री॒स्त्वमा॑ज्ञा॒ता त्वमि॑न्द्रासि दा॒ता ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ viśvā dadhiṣe kevalāni yāny āvir yā ca guhā vasūni | kāmam in me maghavan mā vi tārīs tvam ājñātā tvam indrāsi dātā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । विश्वा॑ । द॒धि॒षे॒ । केव॑लानि । यानि॑ । आ॒विः । या । च॒ । गुहा॑ । वसू॑नि । काम॑म् । इत् । मे॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । मा । वि । ता॒रीः॒ । त्वम् । आ॒ऽज्ञा॒ता । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । अ॒सि॒ । दा॒ता ॥ १०.५४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:54» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (त्वम्) तू (विश्वा केवलानि वसूनि मे) मेरे लिये सरे विशिष्ट धनों को (यानि-आविः-या च गुहा दधिषे) जो प्रसिद्ध-प्रत्यक्ष हैं और जो गुप्त-परोक्ष हैं, उनको धारण करता है (कामम् इत्-मा वितारीः) उन में से तू कमनीय धन को विनष्ट न कर अपितु (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वम्-आज्ञाता त्वं दाता-असि) तू समर्थ-सम्पन्न करनेवाला दाता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा समस्त धनों-ऐश्वर्यों का स्वामी है, चाहे वे प्रसिद्ध-प्रत्यक्ष धन हों या इन्द्रियों से भोगने योग्य हों या गुप्त हों-मन आत्मा से भोगने योग्य हों। उनमें से परमात्मा यथाधिकार कमनीय धन को प्रदान करता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसु [धन]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = सर्वैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वम्) = आप (विश्वा) = सम्पूर्ण (केवलानि) = जिनके कारण आनन्द में विचरण होता है [के वलते] अथवा जो असाधारण हैं, (यानि आहि:) = जो प्रकट हैं या (च गुहा) = और जो गुहा निहित हैं, अप्रकट हैं, उन सब (वसूनि) = निवास के लिये उपयोगी ऐश्वर्यों व पदार्थों को (दधिषे) = धारण करते हैं। सम्पूर्णो ऐश्वर्यों के निधान प्रभु हैं। चाहे वे ऐश्वर्य इस वसुन्धरा से उत्पन्न होकर प्रकट हो रहे हैं और चाहे इसके गर्भ में अप्रकट रूप से रखे हुए हैं । अन्न इत्यादि के रूप में प्रकट वसु हैं तथा आकरों में निहित स्वर्ण रजत आदि अप्रकट वसु हैं । [२] हे मघवन् ! आप (मे) = मेरी (कामम्) = अभिलाषा को (मा वितारी:) = मत हिंसित करिये, अर्थात् उसे अवश्य पूर्ण करिये। आपकी कृपा से मैं सब आवश्यक वसुओं को प्राप्त करनेवाला बनूँ । हे प्रभो ! (त्वं आज्ञाता) = आप ही आज्ञा देनेवाला हैं, आपके निर्देश में ही सारा ब्रह्माण्ड गति करता है । हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (दाता असि) = सब धनों के देनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब वसुओं के निधान हैं। वे ही सब वसुओं के आज्ञाता व दाता हैं। वे ही हमारी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (त्वम्) त्वं खलु (विश्वा केवलानि वसूनि मे) सर्वाणि विशिष्टानि धनानि मह्यम् (यानि-आविः-या च गुहा दधिषे) यानि प्रसिद्धानि प्रत्यक्षाणि यानि च गुप्तानि परोक्षाणि धारयसि (कामम् इत्-मा वितारीः) कमनीयमेव वसुधनं न विनाशय, अपि तु (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वम्-आज्ञाता त्वं दाता-असि) त्वं समर्थयिता दाता च भवसि ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You bear and absolutely comprehend all the treasures of existence, manifest as well as unmanifest. Pray do not frustrate my longing for fulfilment. Indra, you are the knower, the ordainer and the giver.