पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = सर्वैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वम्) = आप (विश्वा) = सम्पूर्ण (केवलानि) = जिनके कारण आनन्द में विचरण होता है [के वलते] अथवा जो असाधारण हैं, (यानि आहि:) = जो प्रकट हैं या (च गुहा) = और जो गुहा निहित हैं, अप्रकट हैं, उन सब (वसूनि) = निवास के लिये उपयोगी ऐश्वर्यों व पदार्थों को (दधिषे) = धारण करते हैं। सम्पूर्णो ऐश्वर्यों के निधान प्रभु हैं। चाहे वे ऐश्वर्य इस वसुन्धरा से उत्पन्न होकर प्रकट हो रहे हैं और चाहे इसके गर्भ में अप्रकट रूप से रखे हुए हैं । अन्न इत्यादि के रूप में प्रकट वसु हैं तथा आकरों में निहित स्वर्ण रजत आदि अप्रकट वसु हैं । [२] हे मघवन् ! आप (मे) = मेरी (कामम्) = अभिलाषा को (मा वितारी:) = मत हिंसित करिये, अर्थात् उसे अवश्य पूर्ण करिये। आपकी कृपा से मैं सब आवश्यक वसुओं को प्राप्त करनेवाला बनूँ । हे प्रभो ! (त्वं आज्ञाता) = आप ही आज्ञा देनेवाला हैं, आपके निर्देश में ही सारा ब्रह्माण्ड गति करता है । हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (दाता असि) = सब धनों के देनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब वसुओं के निधान हैं। वे ही सब वसुओं के आज्ञाता व दाता हैं। वे ही हमारी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं ।