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क उ॒ नु ते॑ महि॒मन॑: समस्या॒स्मत्पूर्व॒ ऋष॒योऽन्त॑मापुः । यन्मा॒तरं॑ च पि॒तरं॑ च सा॒कमज॑नयथास्त॒न्व१॒॑: स्वाया॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ka u nu te mahimanaḥ samasyāsmat pūrva ṛṣayo ntam āpuḥ | yan mātaraṁ ca pitaraṁ ca sākam ajanayathās tanvaḥ svāyāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

के । ऊँ॒ इति॑ । नु । ते॒ । म॒हि॒मनः॑ । स॒म॒स्य॒ । अ॒स्मत् । पूर्वे॑ । ऋष॑यः । अन्त॑म् । आ॒पुः॒ । यत् । मा॒तर॑म् । च॒ । पि॒तर॑म् । च॒ । सा॒कम् । अज॑नयथाः । त॒न्वः॑ । स्वायाः॑ ॥ १०.५४.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:54» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते समस्य महिमनः) तेरे सब महत्त्व के (अन्तं के-उ-नु-अस्मत्-पूर्वे-ऋषयः-आपुः) पार को कौन हमसे पूर्ववर्ती ज्ञानी-तत्त्वदर्शी प्राप्त कर सके हैं ? अर्थात् कोई नहीं, (स्वायाः-तन्वः) स्व व्यापनशक्ति से या अव्यक्त प्रकृति से (यत्-मातरं च पितरं च साकम्-अजनयथाः) जो पृथिवी और द्युलोक को साथ ही तूने उत्पन्न किया है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के महत्त्व का पूर्णरूप से कोई पार नहीं पा सकता कि उसने अपनी व्यापक शक्ति से तथा अव्यक्त प्रकृति से द्युलोक और पृथिवीलोक को-प्रकाशक और प्रकाश्य लोकों को कैसे बनाया है ! ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महिमा का आनन्त्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (ते) = आपकी (समस्य) = सम्पूर्ण (महिमनः) = महिमा के (अन्तम्) = अन्त को (नु) = अब (अस्मात्) = हमारे में से (के) = कौन (पूर्वे) = अपने जीवन में पूर्ति को लाने का प्रयत्न करनेवाले (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा लोग (उ) = निश्चय से (आपुः) = प्राप्त कर पाते हैं । अर्थात् बड़े-से-बड़े तत्त्वज्ञानी भी आपकी महिमा को पूर्णतया माप नहीं सकते। आपकी अनन्त महिमा के अन्त पाने का सम्भव हो ही कैसे सकता है ? [२] (यत्) = जो आप (स्वायाः तन्वः) = अपने इस प्रकृति-रूप शरीर से (मातरं च पितरं च) = पृथिवी रूप माता को और द्युलोक रूप पिता को (साकम्) = साथ-साथ (अजनयथाः) = उत्पन्न करते हैं। मनु के शब्दों में प्रभु ने एक सूर्य के समान देदीप्यमान हैम अड को पैदा किया और 'स्वयमेवात्मनो ध्यानात् तदण्डमकरोद् द्विधा । ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे' [१ । १८] ध्यान के द्वारा उस अण्ड को दो भागों में बाँटकर द्युलोक व पृथ्वीलोक को बना दिया । प्रकृति उपादान है, तो प्रभु इस ब्रह्माण्ड जाल के निमित्तकारण हैं । इस ब्रह्माण्ड का एक-एक लोक प्रभु की महिमा का प्रतिपादन करता है। पृथ्वी से किस प्रकार विविध गन्धों रूपों व रसों को लिये हुए फल-फूल उत्पन्न होते हैं ? द्युलोक को किस प्रकार देदीप्यमान नक्षत्र शोभा से युक्त कर रहे हैं ? इन सब में प्रभु की महिमा का स्मरण होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- उस प्रभु की महिमा अनन्त है। प्रभु इस प्रकृति से भूमि व द्युलोक का अद्भुत निर्माण करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते समस्य महिमनः) तव सर्वस्य महिम्नः-महत्त्वस्य ‘उपधाया अकारस्य लोपाभावश्छान्दसः’ (अन्तं के-उ-नु अस्मत्-पूर्वे-ऋषयः-आपुः) पारं के हि वितर्कनी-यमेतत् ‘नु वितर्के’ [अव्ययार्थनिबन्धनम्) अस्मत्तः पूर्वे द्रष्टारः ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शकाः प्राप्नुयुः, न केऽपीत्यर्थः (स्वायाः तन्वः) स्वव्यापनशक्तितोऽव्यक्त- प्रकृतितो वा (यत्-मातरं च पितरं च साकम्-अजनयथाः) यत् पृथिवीं च दिवं च “द्यौर्मे पिता माता…पृथिवी महीयम्” [ऋ० १।१६४।३३] साकं सहैव त्वमुत्पादयसि ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Which ancient sages and seers before us could ever comprehend the bounds of this absolute glory of yours since you brought into existence both earth and heaven together as mother and father of life from your own material power of Prakrti?