प्रभु का युद्ध-वर्णन माया - मात्र है
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत्) = जो (तन्वा) = शरीर से (वावृधान:) = सब प्रकार से हमारा वर्धन करते हुए आप (अचर:) = गति करते हो। और (जनेषु) = लोगों में बलानि शक्तियों को (प्रब्रुवाणः) = उपदिष्ट करते हुए चलते हैं । (सा) = वह सब (ते) = आपकी (इत्) = ही (माया) = माया है । (माया) = दया है [fity comprssion]। प्रभु ने हमें शरीर देकर तथा शक्तियों का उपदेश देकर हमारे पर सचमुच दया की है। [२] लोग जो नासमझी के कारण (ते) = आपके (यानि युद्धानि) = जिन दस्युओं [satan] से होनेवाले युद्धों का (आहुः) = कहते हैं (सा) = वह (इत्) = भी (माया) = आपकी माया ही है, प्रतीति मात्र है, आपके साथ युद्ध किसने करना ? आप (न अद्य) न तो आज और (न नु पुरा) = नांही पहले भी निश्चय से (शत्रुम्) = शत्रु को (विवित्से) = प्राप्त करते हैं । आपका शत्रु बन ही कौन सकता है ? आपकी कोई विरोधी शक्ति नहीं है। संसार में आपकी व्यवस्था से ही सब कार्य हो रहे हैं। शक्ति व बुद्धि को देकर जीव को स्वयं चलने की जो आपने स्वतन्त्रता दी है उसी के कारण वह गिरता है तो कष्ट भी उठाता है । स्वतन्त्रता देनी भी आवश्यक है, उसके अभाव में तो वह किसी भी प्रकार से उन्नति न कर पाता। संसार के दुःख ईश-विरोधी शक्ति शैतान के कारण नहीं है। नांही प्रभु के इन विरोधियों के साथ कोई युद्ध ही होते हैं ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें उन्नति के साधन प्राप्त कराते हैं । उन साधनों का स्वतन्त्रता से प्रयोग करते हुए हमें गलतियों के कारण कष्ट भी होते हैं । ईश के विरोधी के कारण ये कष्ट नहीं हैं।