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तां सु ते॑ की॒र्तिं म॑घवन्महि॒त्वा यत्त्वा॑ भी॒ते रोद॑सी॒ अह्व॑येताम् । प्रावो॑ दे॒वाँ आति॑रो॒ दास॒मोज॑: प्र॒जायै॑ त्वस्यै॒ यदशि॑क्ष इन्द्र ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tāṁ su te kīrtim maghavan mahitvā yat tvā bhīte rodasī ahvayetām | prāvo devām̐ ātiro dāsam ojaḥ prajāyai tvasyai yad aśikṣa indra ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ताम् । सु । ते॒ । की॒र्तिम् । म॒घ॒ऽव॒न् । म॒हि॒ऽत्वा । यत् । त्वा॒ । भी॒ते इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । अह्व॑येताम् । प्र । आ॒वः॒ । दे॒वान् । आ । अ॒ति॒रः॒ । दास॑म् । ओजः॑ । प्र॒ऽजायै॑ । त्व॒स्यै॒ । यत् । अशि॑क्षः । इन्द्र ॥ १०.५४.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:54» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘इन्द्र’ शब्द से परमात्मा गृहीत है। उसका स्वाभाविक नाम ‘ओ३म्’ ज्योतिर्पिण्डों को ज्योति प्रदान करता है। मानव-कल्याणार्थ वेदज्ञान का उपदेश देता है, यह प्रमुख विषय है।

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे सब ऐश्वर्यों के स्वामी ! (ते महित्वा) तेरे महत्त्व से सिद्ध (तां सु कीर्तिम्) उस शोभन गुणकीर्ति को वर्णन करता हूँ (यत्) जिससे कि (भीते रोदसी त्वा-अह्वयेताम्) भय को प्राप्त द्यावापृथ्वी के समान ज्ञान प्रकाशवाले और अज्ञान अन्धकारवाले जन या राजप्रजा तुझे आह्वान करते हैं-बुलाते हैं (देवान् प्र-अवः-यत्) जिससे कि तू दिव्यगुणवाले आस्तिकों की रक्षा करता है (दासम् अतिरः) उपक्षयकर्त्ता दुष्ट जन को तू नष्ट करता है (इन्द्र यत्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! जो तू (त्वस्यै प्रजायै-ओजः-अशिक्षः) देव और दास प्रजाओं में से एक देवप्रजा के लिए अध्यात्मबल को देता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का महत्त्व महान् है। उसकी गुणकीर्ति स्वतः सिद्ध है। ज्ञानी अज्ञानी दोनों वर्ग उसकी सता को अनुभव करते हुए भय करते हैं। वह सदाचारी ज्ञानियों की पूर्ण रक्षा करता है और असदाचरण करनेवाले दुष्ट जन को दण्ड देता है। अपितु देवश्रेणी की मनुष्यप्रजा को अपना अध्यात्मलाभ प्रदान करता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्यता का प्रादुर्भाव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते) = आपकी (तां सुकीर्तिम्) = उस उत्तम कीर्ति को मैं करता हूँ (यत्) = कि (महित्वा) = आपकी महिमा के कारण (भीते रोदसी) = भयभीत हुए हुए द्युलोक व पृथिवीलोक (त्वा अह्वयेताम्) = आपको पुकारते हैं। 'रोदसी' शब्द संसार के सब व्यक्तियों का यहाँ वाचक है । सब व्यक्ति प्रभु को चाहे भूले रहें, पर कष्ट आने पर विवशता में प्रभु का ही स्मरण करते हैं, सुख में सभी साथी होते हैं, पर दुःख में आपके अतिरिक्त और कोई साथी नहीं होता। [२] जब लोग आपकी ओर झुकते हैं तो आप (देवान् प्रावः) = दिव्यगुणों का रक्षण करते हैं। (दासम्) = दस्युपन को, दास्यव वृत्ति को, आसुरी भावनाओं को (आतिरः) = पराभूत करते हैं । [३] हे (इन्द्र) = सब आसुर भावनाओं का संहार करनेवाले प्रभो ! आप (यत्) = जब (त्वस्यै) = किसी एक धीर (प्रजायै) = विकास की प्रवृत्तिवाले पुरुष के लिये (ओजः) = ओजस्विता व शक्ति को (अशिक्षः) = [प्रायच्छ: सा०] देते हैं तो उसे दिव्यगुणों के वर्धन व आसुर भावों के क्षयवाला बनाते हैं। बस, बात यह है कि विषयों की आपात रमणीयता मनुष्य को उलझाये रखती है, मनुष्य इन सांसारिक चहल- पहलों में प्रभु को भूले रहता है । इस स्थिति में उसमें दिव्यगुणों का ह्रास व आसुर वृत्तियों का प्राबल्य हो जाता है। एक समय वह आता है जब कि वह अपने को कष्टों में उलझा हुआ पाता है। अब वह प्रभु की ओर झुकता है । प्रभु इसमें दिव्यगुणों का विकास करते हैं, उसकी आसुर भावनाओं का क्षय करते हैं । उसे ओजस्वी बनाते हैं कि वह उन्नतिपथ पर आगे बढ़ सके ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की मित्रता में [क] दिव्यगुणों का वर्धन होता है, [ख] आसुर भावनाओं का क्षय होता है, [ग] और ओजस्विता प्राप्त होती है ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते ‘इन्द्र’शब्देन परमात्मा गृह्यते। तस्य स्वाभाविकनाम ‘ओ३म्’ प्रत्येकज्योतिष्मति पिण्डे ज्योतिर्ददाति मानवकल्याणाय वेदज्ञानमुपदिशति, इति प्रमुखविषयाः।

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे सर्वैश्वर्यस्वामिन् ! (ते महित्वा) तव महत्त्वेन सिद्धाम् (तां सु कीर्तिम्) तां शोभनां कीर्तिं गुणगीतिं वर्णयामि (यत्) यतः (भीते रोदसी त्वा-अह्वयेताम्) भयप्राप्तौ द्यावापृथिव्याविव ज्ञानप्रकाशवदज्ञानान्धकारवन्तौ जनौ राजाप्रजाजनौ वा “रोदसी द्यावापृथिव्याविव राजाप्रजाव्यवहारौ” [ऋ० ३।३८।८ दयानन्दः] त्वामाह्वयतः (देवान् प्रावः-यत्)  यतस्त्वं देवान् दिव्यगुणयुक्ता नास्तिकान् रक्षसि (दासम्-अतिरः) उपक्षयकर्त्तारं दुष्टं जनं नाशयसि “अतिरः-हंसि” [ऋ० ४।३०।७ दयानन्दः] (इन्द्र यत्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! यत् त्वम् (त्वस्यै प्रजायै-ओजः-अशिक्षः) अपि तु देवदासयोर्मध्ये वर्तमानायै-एकस्यै देवप्रजायै बलमध्या-त्मबलं च ददासि “शिक्षति दानकर्मा” [निघ० ३।२०] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of glory, I celebrate that renown of yours by the greatness of which the earth and heaven, both struck with awe, call upon you and glorify, by which you protect the holy and generous brilliancies, subdue the unholy negatives and destroyers, and by which you award the strength and lustre of life to your people.