पदार्थान्वयभाषाः - सृष्टि से पूर्व प्रलयावस्था में (असत् च) = यह अव्याकृत जगत् अर्थात् कार्यरूप में न आयी हुई 'प्रकृति', (सत् च) = और सत्ता रूप से रहनेवाला प्रसुप्त-सी अवस्था में पड़ा हुआ 'जीव' ये दोनों (परमे व्योमन्) = सर्वोत्कृष्ट ज्ञान सम्पन्न प्रभु में थे। उस प्रभु में जो कि 'व्योमन् ' = वी+ओम्+अन् =सर्वरक्षक होते हुए एक ओर प्रकृति को उठाये हुए हैं तो दूसरी ओर जीव को । प्रकृति 'वी' है, इसमें ही सम्पूर्ण गति होती है, यही विकृत होकर ब्रह्माण्ड के रूप में आती है और यह चमकती है, इसी के कार्यों का जीव उपभोग करता है [वी- गति प्रजनन कान्ति [वादनेषु]] । जीव 'अन्' है श्वास लेता है। ये प्रकृति और जीव सदा परमात्मा के आधार से रहते हैं । ये प्रभु प्रलयकाल की समाप्ति पर सृष्टि को जन्म देते हैं जैसे एक किसान भूमि में बीज का वपन करता है, इसी प्रकार प्रभु इस प्रकृति में बीज को बोते हैं और इस ब्रह्माण्ड का जन्म होता है इस जन्म देने के कारण प्रभु 'दक्ष'-' सब विकास [growth] को करनेवाले' कहलाते हैं। इस (दक्षस्य) = प्रजापति के (जन्मन्) = विकास की क्रिया को करने पर अर्थात् संसार को बनाने पर (अदितेः उपस्थे) = इस पृथ्वी की गोद में अर्थात् इस भूतल पर सब से प्रथम तो वे प्रभु थे जो कि (ह) = निश्चय से (नः) = हम सब के (अग्निः) = अग्रेणी हैं, आगे ले चलनेवाले हैं और (ऋतस्य) = इस सब सत्यविद्याों की प्रकाशिका वेदवाणी के (प्रथमजा:) = सर्वप्रथम 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा: ' इस ऋषियों के हृदयों में प्रकाश करनेवाले हैं । प्रभु के अतिरिक्त इस संसार में (वृषभः च धेनुः च) = बैल व गौ अर्थात् नर व मादा, वीर्य सेचन में समर्थ 'नर' [वृषभ] तथा दूध पिलाने में समर्थ मादा [ धेनुः धेट् पाने], ये जो कि पूर्वे आयुनि= भरपूर युवावस्था में थे। न बाल थे और ना ही वृद्ध थे। इनके जीवन में सब आवश्यक तत्त्वों का पूरण हो चुका था [पूर्व पूरणे] अतएव ये अगले सन्तानों को जन्म देने में समर्थ थे । इस प्रकार इस सृष्टि का निर्माण हुआ । ' इस सृष्टि में हमें कैसे चलना है' इस विचार से अगला सूक्त प्रारम्भ होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ने हमें जन्म दिया और वेदज्ञान प्राप्त कराया। उसके अनुसार चलते हुए ही हम आगे बढ़ेंगे। इस सूक्त के प्रारम्भ में प्रभु को सब धनों का धरुण कहा था, [१] उस प्रभु के नामों को ही हमें हृदय में धारण करना चाहिए, [२] मन में प्रभुस्मरण करते हुए सर्वहितकारी कर्मों में लगे रहना चाहिए, [३] सत्य के मार्ग पर हम चलें और इसके लिए सात्त्विक अन्नों का ही सेवन करें, [४] इन्द्रियों को आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाला बनाएँ, [५] मर्यादाओं को तोड़ें नहीं, [६] और वेदवाणी के अनुसार अपने जीवन को बनायें, [७] प्रभु की शरण में ही जीवन को चलायें-