पदार्थान्वयभाषाः - गत मन्त्र के अनुसार सुजातम् उत्तम शक्तियों के विकास वाले इस प्रभु-भक्त को (हि) = निश्चय से (ऋतस्य वर्तनयः) = सत्य व यज्ञ के मार्ग सचन्ते सेवन करते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं, यह यज्ञशील होता है तथा सदा सत्याचरण ही करता है। और (प्रदिवः) = प्रकृष्ट प्रकाश व ज्ञान से युक्त अर्थात् बुद्धि को सात्त्विक बनानेवाले (इषः) = अन्न (वाजाय) = शक्ति की वृद्धि के लिए सचन्ते प्राप्त होते हैं। यह उन्हीं अन्नों का सेवन करता है, जो अन्न इस की बुद्धि को सूक्ष्म बनाकर इसे प्रज्ञान = सम्पन्न करें तथा इस की शारीरिक शक्ति की वृद्धि का कारण हों। (रोदसी) = माता व पिता के स्थानापन्न द्युलोक व पृथिवीलोक, अर्थात् इनमें स्थित सभी प्राकृतिक शक्तियाँ इस व्यक्ति को (अधीवासं) = [अधि= उपरि ] उत्कृष्ट निवास से वावसाने आच्छादित करनेवाले होते हैं [वस आच्छादने, आच्छादयित्र्यौ सा० ] इसके जीवन को सूर्यादि सभी देव बड़ा उत्तम बनानेवाले होते हैं। ये द्युलोक व पृथिवीलोक मधूनाम् अत्यन्त मधुर जलों के सेचन से उत्पन्न हुए हुए घृतै अन्नै=मलों के क्षरण व दीप्ति वाले [घृ क्षरणदीप्त्योः] अन्नों से अथवा घृतों और अन्नों से इस व्यक्ति को वावृधाते=खूब बढ़ाते हैं। शुद्ध जलों से उत्पन्न चारों को खानेवाली व शुद्ध जलों के पीनेवाली [सूयवसाद् भगवती हि भूयाः, शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः ] गौवों के दूध से प्राप्त घी भी सात्त्विक होगा और उसके सेवन से इस प्रभु-भक्त की सब शक्तियों का ठीक ही विकास होगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सत्य के मार्ग पर चलें, सात्त्विक अन्नों व घृतों का सेवन करें।