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देवता: अग्निः ऋषि: त्रितः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

ऋ॒तस्य॒ हि व॑र्त॒नय॒: सुजा॑त॒मिषो॒ वाजा॑य प्र॒दिव॒: सच॑न्ते । अ॒धी॒वा॒सं रोद॑सी वावसा॒ने घृ॒तैरन्नै॑र्वावृधाते॒ मधू॑नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtasya hi vartanayaḥ sujātam iṣo vājāya pradivaḥ sacante | adhīvāsaṁ rodasī vāvasāne ghṛtair annair vāvṛdhāte madhūnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋ॒तस्य॑ । हि । व॒र्त॒नयः॑ । सुऽजा॑तम् । इषः॑ । वाजा॑य । प्र॒ऽदिवः॑ । सच॑न्ते । अ॒धी॒वा॒सम् । रोद॑सी॒ इति॑ । व॒व॒सा॒ने इति॑ । घृ॒तैः । अन्नैः॑ । व॒वृ॒धा॒ते॒ इति॑ । मधू॑नाम् ॥ १०.५.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:5» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:33» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्य हि) सृष्टियज्ञ-ब्रह्माण्ड के मध्य में (वर्तनयः-प्रदिवः-इषः) वर्तमान प्रकाशमान ग्रहनक्षत्रादि लोक (वाजाय सुजातं सचन्ते) गतिबल प्राप्ति के लिए सुप्रसिद्ध सूर्यरूप अग्नि को सेवन करते हैं (रोदसी) द्युलोक पृथिवीलोक (अधीवासं वावसाने) ऊपर वस्त्रसमान आच्छादन करते हुए (घृतैः-अन्नैः-मधूनाम्-वावृधाते) सूर्य से प्राप्त तेजों और अन्नों द्वारा प्रजाओं को बहुत बढ़ाते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि या ब्रह्माण्ड में वर्तमान पिण्ड ग्रह आदि सुप्रसिद्ध अग्निरूप सूर्य से बल पाते हैं, द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों अपने ऊपर धारण करते हैं। तेजों अन्नों-तेजशक्ति अन्नशक्ति को प्राप्त कर मनुष्यादि प्रजाओं को समृद्ध करने के लिए द्युलोक सूर्य से तेज शक्ति को लेता है, पृथिवीलोक सूर्य से अन्न शक्ति को लेता है। ऐसे ही प्रतापी गुणवान् राजा प्रजाओं को ज्ञानप्रकाश प्रदान करने की व्यवस्था तथा भोजन की व्यवस्था करे ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋत की वर्तनि

पदार्थान्वयभाषाः - गत मन्त्र के अनुसार सुजातम् उत्तम शक्तियों के विकास वाले इस प्रभु-भक्त को (हि) = निश्चय से (ऋतस्य वर्तनयः) = सत्य व यज्ञ के मार्ग सचन्ते सेवन करते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं, यह यज्ञशील होता है तथा सदा सत्याचरण ही करता है। और (प्रदिवः) = प्रकृष्ट प्रकाश व ज्ञान से युक्त अर्थात् बुद्धि को सात्त्विक बनानेवाले (इषः) = अन्न (वाजाय) = शक्ति की वृद्धि के लिए सचन्ते प्राप्त होते हैं। यह उन्हीं अन्नों का सेवन करता है, जो अन्न इस की बुद्धि को सूक्ष्म बनाकर इसे प्रज्ञान = सम्पन्न करें तथा इस की शारीरिक शक्ति की वृद्धि का कारण हों। (रोदसी) = माता व पिता के स्थानापन्न द्युलोक व पृथिवीलोक, अर्थात् इनमें स्थित सभी प्राकृतिक शक्तियाँ इस व्यक्ति को (अधीवासं) = [अधि= उपरि ] उत्कृष्ट निवास से वावसाने आच्छादित करनेवाले होते हैं [वस आच्छादने, आच्छादयित्र्यौ सा० ] इसके जीवन को सूर्यादि सभी देव बड़ा उत्तम बनानेवाले होते हैं। ये द्युलोक व पृथिवीलोक मधूनाम् अत्यन्त मधुर जलों के सेचन से उत्पन्न हुए हुए घृतै अन्नै=मलों के क्षरण व दीप्ति वाले [घृ क्षरणदीप्त्योः] अन्नों से अथवा घृतों और अन्नों से इस व्यक्ति को वावृधाते=खूब बढ़ाते हैं। शुद्ध जलों से उत्पन्न चारों को खानेवाली व शुद्ध जलों के पीनेवाली [सूयवसाद् भगवती हि भूयाः, शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः ] गौवों के दूध से प्राप्त घी भी सात्त्विक होगा और उसके सेवन से इस प्रभु-भक्त की सब शक्तियों का ठीक ही विकास होगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सत्य के मार्ग पर चलें, सात्त्विक अन्नों व घृतों का सेवन करें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्य हि) सृष्टियज्ञस्य खलु ब्रह्माण्डस्य मध्ये (वर्तनयः-प्रदिवः-इषः) वर्तमानाः-“वर्तनिः-वर्तमानाः” [ऋ० १।१४०।३ दयानन्दः] प्रकाशमानाः प्रजारूपा नक्षत्रादयः “प्रजा वा इषः” [श० १।७।३।१४] (वाजाय सुजातं सचन्ते) सुप्रसिद्धमग्निं सूर्यरूपं सेवन्ते (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ द्युलोकः पृथिवीलोकश्च “रोदसी-द्यावापृथिवीनाम” [निघ० ३।३] (अधीवासं वावसाने) उपरिवस्त्रमिवाच्छादयन्तौ (मधूनाम्) मनुष्याद्याः प्रजाः, व्यत्ययेन द्वितीयास्थाने षष्ठी “प्रजा वै मधुः” [जं० १।८८] (घृतैः-अन्नैः-वावृधाते) तेजोभिरन्नैश्च सूर्यात् प्राप्य वर्धयतः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Visionary scholars who know the paths of law and change in evolution study and apply the versions of Agni evolved and developed in latest form for the achievement of new and extended food, energy and knowledge of reality which heaven and earth both sustaining all forms of life feed for extension with inputs and refinements of the honey sweets of water and energy.