वांछित मन्त्र चुनें
देवता: अग्निः ऋषि: त्रितः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

स॒मा॒नं नी॒ळं वृष॑णो॒ वसा॑ना॒: सं ज॑ग्मिरे महि॒षा अर्व॑तीभिः । ऋ॒तस्य॑ प॒दं क॒वयो॒ नि पा॑न्ति॒ गुहा॒ नामा॑नि दधिरे॒ परा॑णि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samānaṁ nīḻaṁ vṛṣaṇo vasānāḥ saṁ jagmire mahiṣā arvatībhiḥ | ṛtasya padaṁ kavayo ni pānti guhā nāmāni dadhire parāṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒मा॒नम् । नी॒ळम् । वृष॑णः । वसा॑नाः । सम् । ज॒ग्मि॒रे॒ । म॒हि॒षाः । अर्व॑तीभिः । ऋ॒तस्य॑ । प॒दम् । क॒वयः॑ । नि । पा॒न्ति॒ । गुहा॑ । नामा॑नि । द॒धि॒रे॒ । परा॑णि ॥ १०.५.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:5» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषा) महान् (वृषणः) पर्जन्य जलभरे मेघ (समानं नीडं वसानाः) समान-एक ही आग्नेय-अग्नि तत्त्व को ढाँपते हुए-अपने अन्दर रखते हुए (अर्वतीभिः-संजग्मिरे) विद्युत् शक्तियों से सङ्गत हो जाते हैं (ऋतस्य पदं कवयः निपान्ति) जल के प्रापणीय स्वरूप-लक्षण को वृष्टिवेत्ता मेधावी विद्वान् अपने अन्दर रखते हैं, भली-भाँति जानते हैं (गुहा पराणि नामानि दधिरे) उन उत्कृष्ट मेघस्थ जलों को वे प्राप्त करते हैं, बरसा लेते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - आकाश में मेघ आग्नेय तत्त्व के सहारे ठहरते हैं, जब वे विद्युत् से युक्त हो जाते हैं, तब वृष्टि की ओर उन्मुख होते हैं। उनमें जल के स्वरूप को वृष्टिविज्ञानवेत्ता जन स्वरक्षित रखते हैं और जहाँ चाहते हैं, बरसा लेते हैं। इसी प्रकार ज्ञानाग्नि को धारण-कर बुद्धि ज्योति से युक्त होकर, ज्ञानामृत की वृष्टि के लक्ष्य को अपने में धारण कर विद्वान् लोग होते हैं और इच्छानुसार उसकी वृष्टि करते हैं ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नाम-स्मरण

पदार्थान्वयभाषाः - गतमन्त्र के अनुसार प्रभु को जाननेवाले (वृषणः) = शक्तिशाली लोग (समानं नीडम्) = प्रभु रूप एक ही आश्रय घोंसले में रहनेवाले होते हैं । अर्थात् ये सभी को प्रभु का पुत्र समझते हैं, सो प्रभु को ही सब का घर जानते हैं । प्रभु को पिता के रूप में देखनेवाले तथा सब के साथ अविरोध को रखनेवाले ये शक्तिशाली तो होते ही हैं। ये (महिषाः) = [मह पूजायाम्] प्रभु का पूजक करनेवाले प्रभु-भक्त (अर्वतीभिः) = खूब क्रियाशील इन्द्रिय रूप अश्वों से (संजग्मिरे) = सब के साथ मिलकर चलते हैं। अर्थात् इनकी इन्द्रियों की क्रियाएँ परस्पर विरोधी न होकर अनुकूलता वाली होती हैं 'संगच्छध्वम्' इस पिता से दिये गये उपदेश को ये अपने जीवन में अनूदित करनेवाले होते हैं । (कवयः) = ये तत्त्वज्ञानी पुरुष (ऋतस्य पदम्) = ऋत के मार्ग को (निपान्ति) = निश्चय से अपने जीवन में सुरक्षित करते हैं। जीवन में अनृत से दूर होकर सत्य को ही अपनाते हैं। इनकी सब क्रियाएँ ऋत व ठीक ही होती हैं । सूर्य व चन्द्रमा की तरह ठीक समय व स्थान पर क्रियाओं को करते हुए ये कल्याण के मार्ग का आक्रमण करते हैं। इसलिए कि 'मार्ग से कभी विचलित न हो जाएँ' ये (गुहा) = अपनी हृदयरूप गुफा में (पराणि नामानि दधिरे) = उत्कृष्ट नामों का धारण करते हैं । प्रभु के नाम का स्मरण इन्हें न्यायमार्ग से विचलित होने से बचाता है। वे प्रभु को याद करते हैं और उसके निर्देश के अनुसार 'ऋत' का पालन करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही हम सबके घर हैं। हम मिलकर चलते हुए प्रभु के सच्चे उपासक बनते हैं। हम हृदयों में प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए उसके ही मार्ग पर चलते हैं। न्याय मार्ग से भ्रष्ट नहीं होते ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषाः) महान्तः “महिषः-महन्नाम” [निघ० ३।३] (वृषणः) पर्जन्याः मेघाः “वृषा-पर्जन्यः” [निघं० १।६] (समानं नीळं वसानाः) समानमाश्रयमग्निं वसाना आच्छादयन्तो वर्तन्ते (अर्वतीभिः-संजग्मिरे) ईरणवतीभिः-वेगवतीभिर्विद्युद्भिः सङ्गता भवन्ति-संयुक्ता भवन्ति “अर्वत्सु विद्युदादिषु” [यजु० ४।३१ दयानन्दः] (ऋतस्य पदं कवयः-निपान्ति) सत्यस्य-उदकस्य विज्ञानं मेधाविनो रक्षन्ति स्वस्मिन् स्थापयन्ति (गुहा पराणि नामानि दधिरे) पराणि-उपरिस्थितानि-उदकानि “नाम-उदकनाम” (निघं० १।१२) यानि गुहायामिव स्थितानि धारयन्ति ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Great, generous, animated and impregnated forces such as clouds, bearing the same one inner law and spirit of Agni, join with impetuously fast moving forces and, open ended, vibrant, expressive and expansive, observe the universal dynamics of the law, and at their centre continue to bear many other forms and forces of water and energy yet to develop and act further in evolution.