वांछित मन्त्र चुनें

एक॑: समु॒द्रो ध॒रुणो॑ रयी॒णाम॒स्मद्धृ॒दो भूरि॑जन्मा॒ वि च॑ष्टे । सिष॒क्त्यूध॑र्नि॒ण्योरु॒पस्थ॒ उत्स॑स्य॒ मध्ये॒ निहि॑तं प॒दं वेः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ekaḥ samudro dharuṇo rayīṇām asmad dhṛdo bhūrijanmā vi caṣṭe | siṣakty ūdhar niṇyor upastha utsasya madhye nihitam padaṁ veḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

एकः॑ । स॒मु॒द्रः । ध॒रुणः॑ । र॒यी॒णाम् । अ॒स्मत् । हृ॒दः । भूरि॑ऽजन्मा । वि । च॒ष्टे॒ । सिस॑क्ति । ऊधः॑ । नि॒ण्योः । उ॒पऽस्थे॑ । उत्स॑स्य । मध्ये॑ । निऽहि॑तम् । प॒दम् । वेरिति॒ वेः ॥ १०.५.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:5» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में अग्नि शब्द से परमात्मा, विद्युत् और सूर्य वर्णित किये जाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (रयीणाम्) विविध पोषक धनों-अन्नों का (समुद्रः-धरुणः-एकः) सम्यक् उदारदाता तथा धारक एकमात्र (भूरिजन्मा) बहुत प्रकार से बहुत स्थानों में उत्पन्न होनेवाला अग्नि (अस्मद् हृदः-विचष्टे) हमारे हार्दिक भावों को विकसित करता है (उपस्थे निण्योः-ऊधः-सिषक्ति) अन्तरिक्ष में गुप्त रस-जल को सींचती है (उत्सस्य मध्ये निहितं पदं वेः) बहने के स्वभाववाले मेघ के अन्दर रखे प्राप्तव्य जलरूप को प्राप्त हुआ विद्युद्रूप अग्नि ॥१॥
भावार्थभाषाः - विविध अन्न-धनों का उत्पन्नकर्ता तथा धारक विविधरूप में उत्पन्न हुआ अग्नि है। वह हार्दिक भावों का विकास करता है, अन्तरिक्ष में छिपे सूक्ष्म जल को सींचता है, मेघ में रखे जल को पकड़कर नीचे बिखेरता है। इसी प्रकार विद्युद्रूप अग्नि की तरह विद्वान् ज्ञानामृत की वृष्टि अपने अन्तःस्थल से निकालकर जनसमाज में बिखेरता है। राजा भी विज्ञानसाधनों द्वारा मेघ से तथा कूप आदि द्वारा राष्ट्र में जल पहुँचाकर अन्नादि को उत्पन्न करावे ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'धनों के धरुण' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - (एक:) = वे प्रभु एक हैं, उन्हें अपने सृष्टि निर्माण आदि कार्यों के लिए किसी अन्य की सहायता की अपेक्षा नहीं । 'न तत्समोसत्य अभ्यधिकः कुतोऽन्य: ' = उनके समान भी कोई नहीं, अधिक का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अथवा वे प्रभु ( इ गतौ ) सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले हैं । (समुद्रः) = वे सदा आनन्दमय हैं, हर्ष के साथ हैं। (रयीणां धरुणः) = सम्पूर्ण सम्पत्तियों के कोश व धारण करनेवाले हैं । वे (भूरिजन्मा) = अनन्त पदार्थों को जन्म देनेवाले प्रभु (अस्मत्) = हमारे (हृदः) = हृदयों को (विचष्टे) = वारीकी से देख रहे हैं। हृदयों की अन्तःस्थित होते हुए वे हमारे हृदयों की सब बातों को जानते हैं । (निण्योः) = [अन्तर्हितयोः] अन्नमय कोश के अन्दर स्थापित 'मनोमय व विज्ञानमय' कोशों के उपस्थे समीप वर्तमान वे प्रभु (ऊधः सिषक्ति) = सेवन करते हैं । अर्थात् विज्ञानमय कोश में पहुँचकर ही हम प्रभु का दर्शन कर पाते हैं । हे जीव ! तू (उत्सस्य) = ज्ञानस्रोत के, मानस के (मध्ये) = मध्य में (निहितम्) = स्थापित व विद्यमान (पदम्) = 'पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृत: 'उस जाने योग्य व प्राप्त करने के योग्य प्रभु के प्रति (वेः) = जानेवाला है तू सदा उस प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चल । हृदय से ही शरीर में सारे रुधिर का अभिसरण चलता है। यह हृदय रुधिर का आधार है, 'पौराणिक साहित्य में इसे मानसरोवर' कहा गया है। इस मानसरोवर में 'हंस' तैरता है । यह 'हन्ति पाप्मानम्' इस व्युत्पत्ति से परमात्मा ही है। इस प्रभु को हमें प्राप्त करने का यत्न करना चाहिये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वे आनन्दमय प्रभु ही सब धनों के धरुण हैं। वे ही हमारे ज्ञानकोश को भी भरनेवाले हैं। उस हृदयस्थ प्रभु को जाननेवाले हम बनें।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते अग्निशब्देन परमात्मविद्युत्सूर्या वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (रयीणाम्) विविधपोषकधनानामन्नानाम् “रयिं धेहि पोषं धेहि” [काठ० १।७] “पुष्टं रयिः” [श० २।३।४।१३] (समुद्रः-धरुणः-एकः) समुद्राता-सम्यगुद्दाता धारकश्चैक एव (भूरिजन्मा) बहुप्रकारेण बहुषु वा जन्मप्रसिद्धिः-यस्य सोऽग्निः (अस्मद्धृदः-विचष्टे) अस्माकं हृदयभावान् विकासयति (उपस्थे निण्योः-ऊधः-सिषक्ति) अन्तरिक्षे “अपामुपस्थे अपां स्थान अन्तरिक्षे” [निरु० ७।२७] अन्तर्हितं गुप्तं रसं जलं सिञ्चति। “ऊधो दुहन्ति” [काठ० २।९] “षच-सेचने” [भ्वादिः] “सिषक्ति सिञ्चति” [ऋ० ४।२१।७ दयानन्दः] निण्योः-इति=“निण्यम्-अन्तर्हितनाम” [निघ० ३।२] अम् प्रत्ययस्य स्थाने ‘ओस्’ स च डित् डोस्, “सुपां सुपो भवन्तीति वक्तव्यम्” [अष्टा० ७।१।३९। वा०] (उत्सस्य मध्ये निहितं पदं वेः) उत्स्रवणशीलस्य मेघस्य मध्ये पदं प्रापणीयं जलरूपं प्राप्नुहि विद्युद्रूप हे अग्ने ! इति प्रत्यक्षेणोच्यते ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The one deep oceanic treasure hold of all world’s wealth, manifestive in many ways, Agni inspires and expands our hearts with light and generosity, fills the middle space between heaven and earth with vapours of the cloud, and abides at the hidden centre of the mystery deep in the cloud.