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द्यावा॒ यम॒ग्निं पृ॑थि॒वी जनि॑ष्टा॒माप॒स्त्वष्टा॒ भृग॑वो॒ यं सहो॑भिः । ई॒ळेन्यं॑ प्रथ॒मं मा॑त॒रिश्वा॑ दे॒वास्त॑तक्षु॒र्मन॑वे॒ यज॑त्रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dyāvā yam agnim pṛthivī janiṣṭām āpas tvaṣṭā bhṛgavo yaṁ sahobhiḥ | īḻenyam prathamam mātariśvā devās tatakṣur manave yajatram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्यावा॑ । यम् । अ॒ग्निम् । पृ॒थि॒वी इति॑ । जनि॑ष्टाम् । आपः॑ । त्वष्टा॑ । भृग॑वः । यम् । सहः॑ऽभिः । ई॒ळेन्य॑म् । प्र॒थ॒मम् । मा॒त॒रिश्वा॑ । दे॒वाः । त॒त॒क्षुः॒ । मन॑वे । यज॑त्रम् ॥ १०.४६.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:46» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्यावा पृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों (यम्-अग्निं सहोभिः-जनिष्टाम्) जिस अग्रणायक जगत्प्रकाशक परमात्मा को अपने गुण बलों से प्रसिद्ध-प्रदर्शित करते हैं (भृगवः) भर्जनशील रश्मियाँ-किरणें (यम्) जिस परमात्मा को अपने तेजप्रभावों से प्रदर्शित करती हैं (मातरिश्वा देवाः) वायु और द्युलोक-आकाश के पदार्थ (मनवे प्रथमम्-ईळेन्यं यजत्रं ततक्षुः) मननशील आस्तिकजन के लिए प्रमुख श्रेष्ठ स्तुति करने योग्य अध्यात्मयज्ञ में यजनीय परमात्मा को स्पष्ट दर्शाते हैं-उपास्यरूप में सिद्ध करते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - द्युलोक, पृथिवीलोक, जलप्रवाह, किरणें और वायु तथा आकाश के पदार्थ परमात्मा को अपना नायक और कर्ता के रूप में मननशील मनुष्य के लिए दर्शाते हैं-सिद्ध करते हैं। उस परमात्मा की उपासना करनी चाहिए ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्वष्टा व भृगु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यम्) = जिस (अग्निम्) = अग्रणी प्रभु को (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (जनिष्टाम्) = प्रादुर्भूत करते हैं, व्यक्त करते हैं । द्युलोक व पृथिवीलोक में क्रमशः सूर्य, चन्द्र, तारे व सागर उस प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहे हैं। ये प्रभु की विभूतियाँ हैं। (आपः) = ये जल भी उस प्रभु की महिमा का प्रतिपादन कर रहे हैं। जल 'अम्लजन', जो ज्वलन की पोषक वायु है, 'उद्रजन', जो ज्वलनशील है, इन वायुओं में विद्युत् के प्रवेश से उत्पन्न होता है। इस प्रकार उष्ण अग्नि से यह अत्यन्त शान्त जल उत्पन्न हो जाता है। इसका विचार करते ही प्रभु की महिमा का स्मरण होने लगता है, इन जलों में वह प्रभु दिखने लगता है। [२] प्रभु वे हैं (यम्) = जिनको (त्वष्टा) = ' तूर्णमश्रुते नि० ८ । १४' शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाला व्यक्ति, 'त्विषेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणः ' नि० ८ । १४ सर्वतः विद्या से दीप्त पुरुष [द० ५ । ३१ । ४] 'त्वक्षतेर्वा स्यात् करोति कर्मणः ८ । १४ नि० ' अपनी बुद्धि को सूक्ष्म करनेवाला पुरुष तथा (भृगवः) = [भ्रस्ज पाके] तपस्या की अग्नि में अपने को परिपक्व करनेवाले पुरुष (सहोभि:) = अपने में (सहस्) = सहनशक्ति के रूप में प्रकट होनेवाले बल के द्वारा प्रकट करते हैं। ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' निर्बलों के द्वारा वे प्रभु प्राप्य नहीं। [३] इस (ईडेन्यम्) = स्तुति के योग्य (प्रथमम्) = ‘प्रथविस्तारे' सर्वव्यापक (यजत्रम्) = पूजनीय प्रभु को (मातरिश्वा) = वायु तथा (देवा:) = अन्य देव (मनवे) = ज्ञानशील पुरुष के लिये (ततक्षुः) = प्रकट करते हैं । मननशील विचारक लोग ही प्रभु का दर्शन करते हैं। इस दर्शन में वायु उनका सहायक होता है। यह वायु शरीर में 'प्राण' है। प्राणसाधना प्रभु-दर्शन का प्रमुख साधन है । यह चित्तवृत्ति का निरोध करके हमारी वृत्ति को पवित्र बनाती है । वस्तुतः सब दिव्यगुणों का विकास भी इस प्राणसाधना से ही होता है। ये दिव्यगुण ही देव हैं। देव हमें परमात्मा के समीप प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- द्युलोक, पृथिवीलोक व जलों में ज्ञानी तपस्वी लोग प्रभु-महिमा का दर्शन करते हैं। प्राणसाधना के द्वारा उत्पन्न दिव्यगुण इन्हें परमात्मा के समीप ले जाते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्यावा पृथिवी) द्यावापृथिव्यौ द्यौर्द्युलोकः पृथिवीलोकश्चोभौ (यम्-अग्निं सहोभिः जनिष्टाम्) यमग्रणायकं जगत्प्रकाशकं परमात्मानं बलैः प्रादुर्भावयतः-प्रदर्शयतः (आपः-च) जलप्रवाहाश्च स्ववेगैः (भृगवः) भर्जनशीलाः-रश्मयः (यम्) यं परमात्मानं स्वतेजःप्रभावैः प्रदर्शयन्ति (मातरिश्वा देवाः-मनवे प्रथमम्-ईळेन्यं यजत्रं ततक्षुः) वायुः-दिविभवाः पदार्थाः-मननशीलायास्तिकजनाय प्रमुखं श्रेष्ठं स्तुत्यमध्यात्मयज्ञे यजनीयं परमात्मानं तक्षन्ति स्पष्टं दर्शयन्ति, स उपास्य इति शेषः ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Agni, self-refulgent spirit and light of the universe, is the universal presence which the heaven and earth manifest with their vastness, which the blazing lights of the stars reveal with their splendour, Agni, the first and supreme power and presence, lovable and adorable, which the mighty winds and other bright divinities of nature reveal for thinking humanity.