पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यम्) = जिस (अग्निम्) = अग्रणी प्रभु को (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (जनिष्टाम्) = प्रादुर्भूत करते हैं, व्यक्त करते हैं । द्युलोक व पृथिवीलोक में क्रमशः सूर्य, चन्द्र, तारे व सागर उस प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहे हैं। ये प्रभु की विभूतियाँ हैं। (आपः) = ये जल भी उस प्रभु की महिमा का प्रतिपादन कर रहे हैं। जल 'अम्लजन', जो ज्वलन की पोषक वायु है, 'उद्रजन', जो ज्वलनशील है, इन वायुओं में विद्युत् के प्रवेश से उत्पन्न होता है। इस प्रकार उष्ण अग्नि से यह अत्यन्त शान्त जल उत्पन्न हो जाता है। इसका विचार करते ही प्रभु की महिमा का स्मरण होने लगता है, इन जलों में वह प्रभु दिखने लगता है। [२] प्रभु वे हैं (यम्) = जिनको (त्वष्टा) = ' तूर्णमश्रुते नि० ८ । १४' शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाला व्यक्ति, 'त्विषेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणः ' नि० ८ । १४ सर्वतः विद्या से दीप्त पुरुष [द० ५ । ३१ । ४] 'त्वक्षतेर्वा स्यात् करोति कर्मणः ८ । १४ नि० ' अपनी बुद्धि को सूक्ष्म करनेवाला पुरुष तथा (भृगवः) = [भ्रस्ज पाके] तपस्या की अग्नि में अपने को परिपक्व करनेवाले पुरुष (सहोभि:) = अपने में (सहस्) = सहनशक्ति के रूप में प्रकट होनेवाले बल के द्वारा प्रकट करते हैं। ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' निर्बलों के द्वारा वे प्रभु प्राप्य नहीं। [३] इस (ईडेन्यम्) = स्तुति के योग्य (प्रथमम्) = ‘प्रथविस्तारे' सर्वव्यापक (यजत्रम्) = पूजनीय प्रभु को (मातरिश्वा) = वायु तथा (देवा:) = अन्य देव (मनवे) = ज्ञानशील पुरुष के लिये (ततक्षुः) = प्रकट करते हैं । मननशील विचारक लोग ही प्रभु का दर्शन करते हैं। इस दर्शन में वायु उनका सहायक होता है। यह वायु शरीर में 'प्राण' है। प्राणसाधना प्रभु-दर्शन का प्रमुख साधन है । यह चित्तवृत्ति का निरोध करके हमारी वृत्ति को पवित्र बनाती है । वस्तुतः सब दिव्यगुणों का विकास भी इस प्राणसाधना से ही होता है। ये दिव्यगुण ही देव हैं। देव हमें परमात्मा के समीप प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- द्युलोक, पृथिवीलोक व जलों में ज्ञानी तपस्वी लोग प्रभु-महिमा का दर्शन करते हैं। प्राणसाधना के द्वारा उत्पन्न दिव्यगुण इन्हें परमात्मा के समीप ले जाते हैं।