पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'धूञ् कम्पने' धातु से 'धूम' शब्द बनता है, शत्रुओं को कम्पित करनेवाला । उसी का पर्यायवाची 'वेप' शब्द है, यह 'वेप् कम्पने' से बना है। यह (वेपः) = कामादि शत्रुओं को कम्पित करके दूर करनेवाला (अग्निः) = अग्रणी, प्रगतिशील पुरुष (जिह्वया) = अपनी जिह्वा से प्रभरते प्रभु के नामों को धारण करता है। वस्तुतः प्रभु-स्तवन करता हुआ ही यह कामादि शत्रुओं को कम्पित करके दूर भगाता है। [२] यह (वेप चेतसा) = चित्त से वयुनानि [ वयुनं वेतेः कान्तिर्वा प्रज्ञा वा नि० ५ । १५] प्रज्ञानों को तथा (पृथिव्याः) = [ पृथिवी शरीरम् ] शरीर से स्वास्थ्यजनित कान्ति को (प्र) [ भरते] = धारण करता है। कामादि शत्रुओं के दूर होने पर ज्ञान का आवरण नष्ट होता है और ज्ञान की दीप्ति तो चमक ही उठती है, शरीर के स्वास्थ्य की उन्नति से शरीर भी कान्तिमय हो जाता है । [३] (आयवः) = ये [इ-गतौ] प्रगतिशील पुरुष (तम्) = उस प्रभु को (दधिरे) = धारण करते हैं, जो प्रभु (शुचयन्तम्) = [ शुच् दीप्तौ ] अपने भक्तों को ज्ञान से दीप्त करते हैं, (पावकम्) = पवित्र करनेवाले हैं, (मन्द्रम्) = आनन्दस्वरूप व आनन्द को देनेवाले हैं, (होतारम्) = सब कुछ प्राप्त कराते हैं, [सृष्टियज्ञ के महान् होता हैं] तथा (यजिष्ठम्) = अत्यन्त पूज्य हैं [ यज् - पूजा] । यह प्रभु का पूजन ही वस्तुतः भक्त को 'वेप व अग्नि' बनने की क्षमता प्रदान करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु भजन करते हुए, काम को कम्पित करके, उन्नति पथ पर आगे बढ़ें।