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अ॒स्याजरा॑सो द॒माम॒रित्रा॑ अ॒र्चद्धू॑मासो अ॒ग्नय॑: पाव॒काः । श्वि॒ती॒चय॑: श्वा॒त्रासो॑ भुर॒ण्यवो॑ वन॒र्षदो॑ वा॒यवो॒ न सोमा॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asyājarāso damām aritrā arcaddhūmāso agnayaḥ pāvakāḥ | śvitīcayaḥ śvātrāso bhuraṇyavo vanarṣado vāyavo na somāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य । अ॒जरा॑सः । द॒माम् । अ॒रित्राः॑ । अ॒र्चत्ऽधू॑मासः । अ॒ग्नयः॑ । पा॒व॒काः । श्वि॒ती॒चयः॑ । श्वा॒त्रासः॑ । भु॒र॒ण्यवः॑ । व॒न॒ऽसदः॑ । वा॒यवः॑ । न । सोमाः॑ ॥ १०.४६.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:46» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस उपासक के (दमाम्) दमनकर्ता बाधकों से (अरित्राः) रक्षा करनेवाला (अजरासः) जरारहित (अर्चद्धूमासः) अर्चनीय तेजवाला (पावकः) पवित्रकारक (श्वितीचयः) शुभ्रस्वरूप, (श्वात्रासः) शीघ्रकारी, (भुरण्यवः) पालनकर्त्ता (वनर्षदः) सम्भक्ति-स्तुति करनेवाले में प्राप्तिशील-प्राप्त होनेवाला (वायवः-न सोमाः) वायु के समान प्राप्त होनेवाला शान्तस्वरूप (अग्नयः) ज्ञानप्रकाशक परमात्मा है ॥७॥
भावार्थभाषाः - उपासक के बाधकों को नष्ट करनेवाला, उनसे रक्षा करनेवाला परमात्मा अजर, अर्चनीय, तेजवाला, पवित्रकर्ता, शुभ्रस्वरूपवाला, शीघ्रकारी, पालनकर्ता, उपासक के हृदय में प्राप्त होनेवाला, शान्त गतिमान् और ज्ञानप्रकाशक है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गुणों का दशक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य) = इस प्रभु के व्यक्ति, अर्थात् जो प्रभु-प्रवण बने रहते हैं, प्रकृति में उलझते नहीं, वे (अजरासः) = अजीर्ण शक्तिवाले होते हैं ये 'वृद्ध' बनते हैं नकि 'जरन्' । इनकी शक्ति बढ़ती है, जीर्ण नहीं होती। [२] (दमाम्) = दमन करनेवाली वासनाओं के (अरि-त्राः) = प्रति ये 'ऋ गतौ' जानेवाले उनपर आक्रमण करनेवाले और अपना त्राण करनेवाले होते हैं । [३] (अर्चद्धूमासः) = ये प्रभु का अर्चन करते हैं और वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले होते हैं । प्रभु का अर्चन इनकी वासनाओं को दूर करता है। [४] वासनाओं को दूर करके ये (अग्नयः) = प्रगतिशील होते हैं और (पावका:) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले होते हैं। [५] (श्वितीचयः) = 'श्वितिं 'चिन्वन्ति' शुद्ध कर्मों का ही ये सञ्चय करते हैं 'श्विति अञ्च्' शुक्ल मार्ग से जानेवाले होते हैं । [६] (श्वात्रासः) = [श्वात्राः शिवाः श० ३ । ९-४ । १६] ये शिव व कल्याण ही करनेवाले होते हैं। ['श्वात्रं धनम्' नि० २।१० ] ये ज्ञानधनवाले होते हैं। [७] (भुरण्यवः) = ये सबका भरण करनेवाले होते हैं। [८] (वनर्षदः) = [वन-उपासना, सद्-बैठना] ये सदा उपासना में आसीन होनेवाले हैं, प्रभु का स्मरण करते हुए ही ये विविध कार्यों में व्यापृत रहते हैं । [९] वायवः नये वायुओं की तरह होते हैं, सतत क्रियाशील होते हैं, ये कभी अकर्मण्य नहीं होते। [१०] सदा उत्तम कर्मों में लगे हुए ये लोगों से आदर को प्राप्त करते हैं, परन्तु (सोमाः) = अत्यन्त सौम्य स्वभाववाले होते हैं, शान्त होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु - प्रवण लोगों का जीवन अजीर्ण शक्तियोंवाला व अत्यन्त शान्त व सौम्य होता हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) एतस्योपासकस्य (दमाम्) दमनकर्तृभ्यो बाधकेभ्यः “दमाम्-यो दामयति तम्” [ऋ० ६।३।७ दयानन्दः] (अरित्राः) तेभ्य एव अरिभ्यस्त्राता “अरित्राः-ये अरिभ्यस्त्रायन्ते ते” [यजु० ३३।१ दयानन्दः] ‘अत्र सर्वत्र बहुवचनमादरार्थम्’ (अजरासः) अजरः-जरारहितः (अर्चद्धूमासः) ज्वलत्तेजाः-अर्चनीयतेजोयुक्तो वा (पावकाः) पवित्रकारकः (श्वितीचयः) श्वेतवर्णसंस्त्यानः शुभ्रः “श्वितीचयः ये श्वितिं श्वेतवर्णं चिन्वन्ति ते” [यजु० ३३।१ दयानन्दः] (श्वात्रासः) शीघ्रकारी (भुरण्यवः) पालनकर्त्ता (वनर्षदः) ये वने वनयितरि सम्भाजयितरि स्तोतरि सीदन्ति ते-स्तोतरि प्रापणशीलः “वनर्षदः ये वने सीदन्ति ते” [ऋ० २।३१।१ ‘वा छन्दसीति रुडागमः’ दयानन्दः] (वायवः-न सोमाः) वायव इव शान्तप्रवाहाः-वायुरिव शान्तप्रवाहवान् (अग्नयः) ज्ञानप्रकाशकः परमात्माऽस्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The eternal, adorable and all saving flames and fragrances of the powerful fires of this Agni are purifying, sanctifying, invigorating, instantly effective, pervasive in forests, clouds and waters, and they are vibrant and blissful as the soothing pleasures of soma.