पदार्थान्वयभाषाः - [१] (त्रितः) = 'त्रीन् तरति वा त्रीन् तनोति' काम-क्रोध-लोभ को जो तैर जाता है अथवा ज्ञान, कर्म व उपासना का जो विस्तार करता है अथवा शरीर, मन व बुद्धि का जो विकास करता है, (स्तभूयन्) = जो उत्पन्न सोमरूप शक्ति को शरीर में ही रोकने के लिये इच्छा करता है, (योनौ) = सब के मूल उत्पत्ति - स्थान प्रभु में (परिवीतः) = चारों ओर से व्याप्त हुआ है, प्रभु के गोद में ही मानो बैठा हुआ है, यह त्रित पस्त्यासु अन्तः प्रजाओं के अन्दर नि सीदत् निषपक्ष होता है। प्रजाओं के हित के लिये उन्हीं में विचरण करनेवाला होता है । [२] (अतः) = इस प्रभु से (संगृभ्या) = ज्ञान को ग्रहण करके, यह (दमूना) = दान्त मनवाला अथवा दान के मनवाला (त्रित विशाम्) = प्रजाओं के (विधर्मणा) = विशेषरूप से धारण के हेतु से (यन्त्रैः) = नियमनों के साथ, शरीर, वाणी व मन के दमन के साथ, अर्थात् इन तीनों का नियमन करता हुआ (नॄन्) = मनुष्यों को (ईयते) = प्राप्त होता है । उसका नियमित जीवन लोगों के लिये उत्तम उदाहरण को उपस्थित करता है । [३] यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि जिसने लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त होना ही उसे [क] 'त्रित' होना चाहिए, काम-क्रोध-लोभ से ऊपर तथा ज्ञान-कर्म-उपासना तीनों को अपनानेवाला, [ख] यह स्तभूयन् हो, शक्ति का शरीर में ही स्तम्भन करे । अशक्त शक्ति ने क्या लोकहित करना, [ग] (योनौ परिवीत:) = यह प्रभु के आश्रय से रहनेवाला हो । यह प्रभु का सान्निध्य उसे निर्भीक बनाता है। [घ] (दमूना:) = यह दान्त मनवाला व दान की वृत्तिवाला हो । लोभ लोकहित का विरोधी है। [ङ] (यन्त्रैः) = यह शरीर, वाणी व मन तीनों का नियमन करे, त्रिदण्डी हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम हित बनकर लोकहित के कार्यों में व्यापृत हों ।