'वना' - धी [ उपासनायुक्त बुद्धि व कर्म ]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] तृतीय मन्त्र में कहा था कि उस प्रभु को 'त्रित' शरीर, मन व बुद्धि तीनों की शक्तियों का विकास करनेवाला व्यक्ति प्राप्त करता है प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि त्रित ही नहीं (अपितु मूरा:) = अल्पज्ञ मूढ़ जीव भी, संसार में विविध अनुभवों को लेने के उपरान्त, (गर्भं नयन्तः) = अपने प्रवृत्त हृदयदेश में प्रभु को प्राप्त कराने के हेतु से (वनां धियम्) = समजनवाली बुद्धि व कर्म को (धुः) = धारण करते हैं [वन संभक्तौ, धी- बुद्धि व कर्म] उपासना को अपनाते हैं, ज्ञानपूर्वक कर्म करने में होते हैं । [२] इस उपासनामयी बुद्धि व कर्म के द्वारा वे उस प्रभु को प्राप्त करते हैं जो कि (भूः प्रजयन्तम्) = इस पृथ्वीलोक का प्रकृष्ट विजय करनेवाले हैं । यहाँ हमें जो भी विजय प्राप्त होती है वह मूल में उस प्रभु की ही विजय होती है। (महाम्) = [मह पूजायाम्] वे प्रभु ही वस्तुतः पूजा के योग्य हैं (विपोधाम्) = मेधावियों का वे धारण करनेवाले हैं। प्रभु धारण तो करते हैं, धारण के लिये ही उन्होंने 'इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' दी हैं। पर इनका समझदारी से प्रयोग करना ही मेधाविता है। हम नासमझी से चलेंगे तो ये ही साधन हमारे विनाश का भी कारण बन सकते हैं । (अमूरम्) = वे प्रभु (अ) = मूढ़ हैं, वे इस संसार में रतिवाले नहीं हो जाते। (पुरां दर्माणम्) = वे प्रभु उपासकों के इन शरीर रूप पुरों का विदारण करनेवाले हैं । 'स्थूल, सूक्ष्म व कारण' शरीर ही तीन पुर हैं । इनके बन्धन से मुक्त होकर हम मोक्ष को प्राप्त करते हैं । यह मोक्ष प्रभु की उपासना से ही मिलता है । वे प्रभु (हिरिश्मश्रुम्) = [श्म = शरीर] शरीर में आश्रय करनेवाली इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूप साधनों से हमारे कष्टों का हरण करनेवाले हैं। इनका ठीक उपयोग हमें उन्नत करता हुआ दुःखों से तरानेवाला होता है। (न अर्वाणम्) = वे प्रभु किसी भी प्रकार हमारी हिंसा नहीं करते, प्रभु से दिये गये दण्ड भी हमारे कल्याण के लिये ही होते हैं । (धनर्चम्) = [धनति ऋच:, धन् to sound] वे प्रभु ऋचाओं का, विज्ञान वाणियों का उच्चारण करनेवाले हैं अथवा [धन अर्च्] जीवन के लिये आवश्यक धनों को प्राप्त कराने से भक्त का अर्चन करनेवाले हैं। ज्ञान को प्राप्त करके हम इन धनों का सदुपयोग करते हुए कभी हिंसित नहीं होते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की रक्षा के पात्र हम तभी होते हैं जबकि मेधावी - समझदार बनें। उस प्रभु की प्राप्ति के लिये 'वना धी' का धारण आवश्यक है। यह 'वना धी' उपासनायुक्त बुद्धि व कर्म है । हमारे हृदय में उपासना की वृत्ति हो, मस्तिष्क में ज्ञान व हाथों में कर्म । तभी हम प्रभु को प्राप्त करेंगे।