वांछित मन्त्र चुनें

प्र भू॒र्जय॑न्तं म॒हां वि॑पो॒धां मू॒रा अमू॑रं पु॒रां द॒र्माण॑म् । नय॑न्तो॒ गर्भं॑ व॒नां धियं॑ धु॒र्हिरि॑श्मश्रुं॒ नार्वा॑णं॒ धन॑र्चम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra bhūr jayantam mahāṁ vipodhām mūrā amūram purāṁ darmāṇam | nayanto garbhaṁ vanāṁ dhiyaṁ dhur hiriśmaśruṁ nārvāṇaṁ dhanarcam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । भूः॒ । जय॑न्तम् । म॒हान् । वि॒पः॒ऽधाम् । मू॒राः । अमू॑रम् । पु॒राम् । द॒र्माण॑म् । नय॑न्तः । गर्भ॑म् । व॒नाम् । धिय॑म् । धुः॒ । हिरि॑ऽश्मश्रुम् । न । अर्वा॑णम् । धन॑ऽअर्चम् ॥ १०.४६.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:46» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:1» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जयन्तम्) जड़-चेतन को स्वाधीन करते हुए (महाम्) महान् (विपोधाम्) मेधावी स्तुतिकर्त्ताओं के धारण करनेवाले (पुरां दर्माणम्) मानसिक वासनाओं के नष्ट करनेवाले (अमूरम्) सदा सावधान-सर्वज्ञ (गर्भम्) स्तुति करने योग्य परमात्मा को (नयन्तः) अपने अन्दर प्राप्त करते हुए (मूढाः) अल्पज्ञ मनुष्य भी (प्र भूः) समर्थ हो जाते हैं-कुशल हो जाते हैं (वनाम्) वननीय (हिरिश्मश्रुम्) हिरण्यश्मश्रु जैसे तेजस्वी (अर्वाणं न) व्याप्त गतिमान् घोड़े की भाँति (धनर्चम्) प्रसन्न करनेवाली अर्चा-स्तुति जिसके लिए की जाये, ऐसे परमात्मा के प्रति (धियं धुः) बुद्धि-आस्तिकता को मनुष्य धारण करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा समस्त जड़-चेतन को अपने अधिकार में रखे हुए है। वह अपने उपासकों की वासनाओं को नष्ट करता है। अल्पज्ञानी मनुष्य उसकी उपासना से कुशल बन जाते हैं। उस तेजस्वी परमात्मा की यथार्थ अर्चना और उसके प्रति आस्तिक बुद्धि मनुष्यों को रखनी चाहिए ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वना' - धी [ उपासनायुक्त बुद्धि व कर्म ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] तृतीय मन्त्र में कहा था कि उस प्रभु को 'त्रित' शरीर, मन व बुद्धि तीनों की शक्तियों का विकास करनेवाला व्यक्ति प्राप्त करता है प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि त्रित ही नहीं (अपितु मूरा:) = अल्पज्ञ मूढ़ जीव भी, संसार में विविध अनुभवों को लेने के उपरान्त, (गर्भं नयन्तः) = अपने प्रवृत्त हृदयदेश में प्रभु को प्राप्त कराने के हेतु से (वनां धियम्) = समजनवाली बुद्धि व कर्म को (धुः) = धारण करते हैं [वन संभक्तौ, धी- बुद्धि व कर्म] उपासना को अपनाते हैं, ज्ञानपूर्वक कर्म करने में होते हैं । [२] इस उपासनामयी बुद्धि व कर्म के द्वारा वे उस प्रभु को प्राप्त करते हैं जो कि (भूः प्रजयन्तम्) = इस पृथ्वीलोक का प्रकृष्ट विजय करनेवाले हैं । यहाँ हमें जो भी विजय प्राप्त होती है वह मूल में उस प्रभु की ही विजय होती है। (महाम्) = [मह पूजायाम्] वे प्रभु ही वस्तुतः पूजा के योग्य हैं (विपोधाम्) = मेधावियों का वे धारण करनेवाले हैं। प्रभु धारण तो करते हैं, धारण के लिये ही उन्होंने 'इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' दी हैं। पर इनका समझदारी से प्रयोग करना ही मेधाविता है। हम नासमझी से चलेंगे तो ये ही साधन हमारे विनाश का भी कारण बन सकते हैं । (अमूरम्) = वे प्रभु (अ) = मूढ़ हैं, वे इस संसार में रतिवाले नहीं हो जाते। (पुरां दर्माणम्) = वे प्रभु उपासकों के इन शरीर रूप पुरों का विदारण करनेवाले हैं । 'स्थूल, सूक्ष्म व कारण' शरीर ही तीन पुर हैं । इनके बन्धन से मुक्त होकर हम मोक्ष को प्राप्त करते हैं । यह मोक्ष प्रभु की उपासना से ही मिलता है । वे प्रभु (हिरिश्मश्रुम्) = [श्म = शरीर] शरीर में आश्रय करनेवाली इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूप साधनों से हमारे कष्टों का हरण करनेवाले हैं। इनका ठीक उपयोग हमें उन्नत करता हुआ दुःखों से तरानेवाला होता है। (न अर्वाणम्) = वे प्रभु किसी भी प्रकार हमारी हिंसा नहीं करते, प्रभु से दिये गये दण्ड भी हमारे कल्याण के लिये ही होते हैं । (धनर्चम्) = [धनति ऋच:, धन् to sound] वे प्रभु ऋचाओं का, विज्ञान वाणियों का उच्चारण करनेवाले हैं अथवा [धन अर्च्] जीवन के लिये आवश्यक धनों को प्राप्त कराने से भक्त का अर्चन करनेवाले हैं। ज्ञान को प्राप्त करके हम इन धनों का सदुपयोग करते हुए कभी हिंसित नहीं होते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की रक्षा के पात्र हम तभी होते हैं जबकि मेधावी - समझदार बनें। उस प्रभु की प्राप्ति के लिये 'वना धी' का धारण आवश्यक है। यह 'वना धी' उपासनायुक्त बुद्धि व कर्म है । हमारे हृदय में उपासना की वृत्ति हो, मस्तिष्क में ज्ञान व हाथों में कर्म । तभी हम प्रभु को प्राप्त करेंगे।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जयन्तम्) जडचेतनात्मकं सर्वं स्वाधीने कुर्वन्तम् (महाम्) महान्तम् (विपोधाम्) मेधाविनः स्तोतुर्धारकम्  “विपः-मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (पुरां दर्माणम्) मनसां मनोवासनानाम् “मन एव पुरः” [श० १०।३।५।७] विदारकम् (गर्भम्) स्तोतव्यम् “गर्भः स्तोतव्यः” [ऋ० १।७०।२ दयानन्दः] (अमूरम्) अमूढं सर्वज्ञम् “अमूरः-अमूढः” [निरु० ६।८] (नयन्तः) स्वान्तरे प्रापयन्तः (मूढाः) अल्पज्ञाः (प्र भूः) प्रभवेयुः “भूः-भव” [ऋ० १।३३।३ दयानन्दः] “लोडर्थे लुङ् न माङ्योगे-इत्यडभावः, दयानन्दः” वचनव्यत्ययः (वनाम्) वननीयम् “अमि पूर्वरूपाभावश्छन्दसि वावचनात्, सायणः” (हिरिश्मश्रुम्) हिरण्यश्मश्रुमिव तेजस्विनम् “हिरिश्मश्रुः हिरण्यमिव श्मश्रूणि यस्य सः” [ऋ० ५।५।७ दयानन्दः] (अर्वाणं न) अश्वमिव व्याप्तगतिमन्तम् (धनर्चम्) धना प्रीणनीयाऽर्चा यस्मै तं परमात्मानम् (धियं धुः) प्रज्ञां धारयन्तु जनाः “धुः-दधति” [ऋ० ५।५८।७ दयानन्दः] ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Earnest men of love, passion and faith, but, being human, limited in intelligence, hold at heart, worship and serve Agni pervading and dominating the world of existence, great, sustainer of the vibrant wise, all knowing and wise, breaker of the strongholds of negativity and darkness, the original seed and source of life, beatific, supremely intelligent, golden flamed and divinely adorable. Men hold at heart, worship and serve this omnipresent Agni being more dynamic than the dynamics of nature, the instant presence that it is.