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प्र होता॑ जा॒तो म॒हान्न॑भो॒विन्नृ॒षद्वा॑ सीदद॒पामु॒पस्थे॑ । दधि॒र्यो धायि॒ स ते॒ वयां॑सि य॒न्ता वसू॑नि विध॒ते त॑नू॒पाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra hotā jāto mahān nabhovin nṛṣadvā sīdad apām upasthe | dadhir yo dhāyi sa te vayāṁsi yantā vasūni vidhate tanūpāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । होता॑ । जा॒तः । म॒हान् । न॒भः॒ऽवित् । नृ॒ऽसद्वा॑ । सी॒द॒त् । अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । दधिः॑ । यः । धायि॑ । सः । ते॒ । वयां॑सि । य॒न्ता । वसू॑नि । वि॒ध॒ते । त॒नू॒ऽपाः ॥ १०.४६.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:46» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:1» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘अग्नि’ शब्द से परमात्मा गृहीत है। वह जड़-जङ्गम का आधार, मनुष्यों का कर्मप्रेरक, सृष्टिविषयक विज्ञानदाता, स्तुति-प्रार्थनावचनों का अङ्गीकार करनेवाला इत्यादि विषय वर्णित हैं ।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-महान्) जो सबसे महान् (जातः) प्रसिद्ध (होता) सबको अपने अन्दर धारण करनेवाला (नभोवित्) जो वस्तु नहीं भी प्रतीत होती हैं, ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तुओं का भी ज्ञाता (नृषद्वा) मुमुक्षुओं के हृदय में साक्षात् होनेवाला (अपाम्-उपस्थे) प्राणों के आश्रयरूप हृदय में वर्तमान है (दधिः-धायि) सब जगत् को धारण करनेवाला आश्रित किया जाता है (सः) वह परमात्मा (तनूपाः) आत्माओं का रक्षक (विधते ते) तुझ उपासना करते हुए के लिए (वयांसि वसूनि यन्ता) प्राणों को, जीवन के साधन भोक्तव्य धनों को नियत करता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब जड़-जङ्गम का आधार है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म का भी ज्ञाता, प्राणियों को रक्षा के साधन देनेवाला, जीवनशक्ति तथा जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का देनेवाला, सबका आश्रयणीय और उपास्य है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्वमहान् होता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (महान् होता) = सर्वमहान् होता (प्रजात:) = हो गये हैं। प्रभु ने जीव के हित के लिये सब कुछ दे दिया है। संसार के व्यक्ति कुछ न कुछ अपनी आवश्यकताएँ भी रखते हैं, सो उनके लिये शत प्रतिशत होता बनना कठिन होता है। प्रभु ही पूर्णरूप से होता बनते हैं । वे प्रभु (नभोवित्) = इस सम्पूर्ण आकाश को जाननेवाले प्राप्त करनेवाले हैं, सर्वव्यापक हैं, आकाश ही हैं (नृषद्वा) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले लोगों के अन्दर वे (आसीन) = होते हैं । (अपां उपस्थे) = कर्मों की गोद में प्रभु (सीदत्) = बैठते हैं। अर्थात् कर्मशील व्यक्ति को ही प्रभु का दर्शन होता है, अकर्मण्य को नहीं । [२] (दधिः) = वे सबका धारण करनेवाले हैं, वे प्रभु (यः) = जो 'वत्सप्री' लोगों के द्वारा (धायि) = अपने हृदयों में धारण किये जाते हैं । [३] (स) = वे प्रभु ही (ते विधते) = तुझ उपासक के लिये (वयांसि) = आयुष्य वर्धक सात्त्विक अन्नों को तथा (वसूनि) = वसुओं को (यन्ता) = प्राप्त कराते हैं । निवास के लिये आवश्यक सब धनों को वे देनेवाले हैं। (तनूपा:) = हमारे शरीरों की रक्षा करनेवाले हैं। शरीर रक्षण के लिये आवश्यक सब वसु उस प्रभु से प्राप्त होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु सर्वमहान् होता हैं, वे कर्मशील पुरुषों में वास करते हैं। हमारे रक्षण के लिये अन्नों व धनों को प्राप्त कराते हैं।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते ‘अग्नि’शब्देन परमात्मा गृह्यते स च जडजङ्गमानामाधारः, मनुष्याणां कर्मप्रेरकः, सृष्टेर्विज्ञानदाता, स्तुतिप्रार्थना-वचनानामङ्गीकर्त्तेत्यादयो विषयाः सन्ति ।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः महान्) यः खलु महान् सर्वतः स्वरूपतो महान् (जातः) प्रसिद्धः (होता) सर्वेषामादाता स्वस्मिन् ग्रहीता (नभोवित्) न भान्ति यानि तानि वस्तुजातानि वेत्ति सः, सूक्ष्मातिसूक्ष्मस्य ज्ञाता (नृषद्वा) नृषु मुमुक्षुषूपासकेषु “नरो ह वै देवविशः” [जै० १।८९] सीदति साक्षाद् भवति ‘सद धातोः क्वनिप्’ (अपाम्-उपस्थे) सर्वेषां प्राणानाम् “आपो वै प्राणाः” [श० ४।८।२।२] उपस्थाने हृदये वर्तमानोऽस्ति (दधिः-धायि) सर्वं जगद् दधाति धारयति स सर्वधारकः, धीयते-आश्रियते (सः) स खलु परमात्मा (तनूपाः) आत्मनां रक्षकः “आत्मा वै तनूः” [६।७।२।६] (विधते ते) उपासनां कुर्वते तुभ्यम् (वयांसि वसूनि यन्ता) प्राणान् “प्राणो वै वयः” [ऐ० १।२८] जीवनसाधनान् भोक्तव्यधनानि च नियतीकर्त्ताऽस्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - High priest of the cosmic yajna of creation, universally self-manifested, great and glorious, pervasive in space and things even beyond the senses, abiding in the heart and soul of humanity, Agni rolls at the heart of the dynamics of existence. O man, the omnipresent light of the universe which holds, controls and sustains everything is celebrated in the Vedas and worshipped at heart. It is Agni, sustainer of the individual body and the cosmic form, ruler and controller of everything, that bears and brings you all food and energies and blesses you with all wealth, honour and excellence of life.