पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उशिक्) = [वष्टेः कान्तिकर्मणः ] यह सबके भले की कामनावाला होता है, (पावक:) = अपने जीवन को पवित्र बनाकर औरों को भी पवित्र जीवनवाला बनाने का यत्न करता है। (अरतिः) = विषयों में रति व आसक्तिवाला नहीं होता। (सुमेधाः) = उत्तम बुद्धिवाला व [मेध यज्ञ] उत्तम यज्ञोंवाला होता है। [२] यह (अग्निः) = प्रगतिशील जीवनवाला (अमृतः) = विषयों के पीछे न मरनेवाला व्यक्ति (मर्तेषु) = विषयों के पीछे मरनेवाले, आसक्तिवाले पुरुषों में, (निधायि) = प्रभु के द्वारा ही स्थापित किया जाता है । यह उनमें रहता हुआ अपने क्रियात्मक जीवन से व ज्ञान - ज्योति से उनके जीवन को उन्नत करने का प्रयत्न करता है। (इयर्ति) = इसी उद्देश्य से यह गतिवाला होता है, बड़ा क्रियाशील होता है। (धूमम्) = विषय-वासनाओं का कम्पित करके दूर करनेवाले (अरुषम्) = आरोचमान, समन्तात् दीप्त, ज्ञान को (भरिभ्रत्) = यह धारण करता है और (उत्) = विषयासक्ति से ऊपर उठकर (शुक्रेण शोचिषा) = दीप्त [ शुच्] व क्रियामय [ शुक् गतौ] ज्ञानदीप्ति से यह (द्यां इनक्षन्) = सारे द्युलोक को व्याप्त कर देता है। यह सर्वत्र इस ज्ञान को फैलानेवाला बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्वयं उच्च व दीप्त जीवनवाले बनकर ज्ञान-प्रसार द्वारा सबका हित करने की कामनावाले हों।